116 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
क्या हिंदू समाज-व्यवस्था में व्यक्ति का महत्व है? क्या यह उसकी विशिष्टता तथा नैतिक जवाबदेही को मान्यता देती है? क्या यह उसे प्रतिबंधों का दास न मानकर उसे राज्य के विरुद्ध सिर उठाने का अधिकार देकर उसे साध्य के रूप में स्वीकार करती है? इस विषय पर बातचीत करने के लिए निर्गमन उस प्रसंग को स्मरण करना होगा, जब जहोवा ने इजोकिल से कहा थाः
‘‘देखो! सभी आत्माओं पर मेरा अधिकार है, जैसे की पिता की आत्मा मेरी
है वैसे ही पुत्र की आत्मा भी मेरी है, जो आत्मा पाप-कर्म करती है, वह
नष्ट हो जाएगी। ......पुत्र, पिता के दुराचार का भागीदार न होगा, और न
पिता ही पुत्र के दुराचार का भागी होगा। पुण्यात्मा की पवित्रता का लाभ
उसी पुण्यात्मा को मिलेगा, तथा पापी के पाप-कर्म का परिणाम उसी पापात्मा
को भुगतना पड़ेगा।’’
यहां व्यक्ति विशेष की विशिष्टता तथा उसके नैतिक दायित्व पर बल दिया गया है। हिंदू समाज-व्यवस्था व्यक्ति को सामाजिक उद्देश्य का केंद्र नहीं मानती, क्योंकि हिंदू समाज-व्यवस्था मुख्य रूप से श्रेणी या वर्ण पर आधारित है, न कि व्यक्ति पर। मूल तथा औपचारिक रूप से हिंदू समाज-व्यवस्था ने चार वर्णों को मान्यता दी हैः (1) ब्राह्मण, (2) क्षत्रिय, (3) वैश्य तथा (4) शूद्र। आज इसमें पांच वर्ग शामिल हैं। पांचवें को पंचम या अस्पृश्य कहा जाता है। हिंदू समाज की इकाई न कोई ब्राह्मण व्यक्ति है और न क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र अथवा पंचम वर्ग का व्यक्ति ही उसकी इकाई है। यहां तक कि परिवार को भी हिंदू समाज-व्यवस्था द्वारा समाज की इकाई नहीं माना जाता। हां, केवल शादी-विवाह तथा उत्तराधिकार के मामलों में ऐसा माना जाता है। हिंदू समाज-व्यवस्था में व्यक्ति विशेष की योग्यता का कोई स्थान नहीं है तथा वैयक्तिक न्याय का भी ध्यान नहीं रखा जाता है। यदि किसी व्यक्ति को कोई विशेषाधिकार प्राप्त है तो ऐसा इसलिए नहीं है कि वह व्यक्तिगत रूप से उसका अधिकारी है। यह विशेषाधिकार उसे उसके वर्ण के कारण मिलता है, और यदि वह उसका उपभोग करता है तो सिर्फ इसलिए कि वह एक वर्ण विशेष का है। इसके विपरीत यदि किसी व्यक्ति को कष्ट भोगना पड़ रहा है तो उसका कारण भी उसका वर्ण ही हैं, यह दुरावस्था वर्ण के आधार पर थोपी जाती है और यदि वह इसके कारण पिस रहा है तो इसका उत्तरदायी उसका वर्ण है।
क्या हिंदू समाज-व्यवस्था भाई-चारे को मानती है? ईसाई तथा मुसलमानों की तरह हिंदू भी यही मानते हैं कि इंसान को ईश्वर ने पैदा किया है। लेकिन जहां ईसाई और मुसलमान इसे पूर्ण सच्चाई मानते हैं, हिंदू इसे अर्द्ध-सत्य मानते हैं। उनके अनुसार इस पूर्ण सत्य के दो भाग हैं पहला भाग तो यह है कि मनुष्य को ईश्वर ने