2. हिंदू समाज व्यवस्था : इसके मूलभूत सिद्धांत - Page 133

118 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

2.46 ब्राह्मण का दंड केश तक, क्षत्रिय का दंड ललाट तक तथा वैश्य का

दंड नाक तक लंबा होना चाहिए।

2.48 सूर्योपसना के बाद अपनी पसंद का दंड लेकर अग्नि की प्रदक्षिणा कर

विद्यार्थी ब्रह्मचारी को विधिपूर्वक भिक्षा मांगनी चाहिए।

2.49 उपवीत ब्राह्मण को ‘भवति’ शब्द का वाक्य के पहले उच्चारण कर

क्षत्रिय को भवति शब्द का वाक्य के मध्य में उच्चारण कर तथा वैश्य को

भवति शब्द का वाक्य के अंत में उच्चारण कर भिक्षा याचना करनी चाहिए।

इसको पढ़कर कोई भी इन भिन्नाओं के कारणों के बारे में पूछ सकता है उपुर्यक्त नियम विद्यार्थियों या तथाकथित ब्रह्मचारियों से संबंधित हैं जो वेदों का अध्ययन करने को तत्पर हैं, यह भिन्नताएं क्यों होनी चाहिएं? ब्राह्मण बालक के उपनयन की उम्र और क्षत्रिय या वैश्व बालक के उपनयन की उम्र में भिन्न्ता क्यों होनी चाहिए? उनके वस्त्र भिन्न-भिन्न प्रकार के क्यों होने चाहिए, उनके दंड अलग-अलग पेड़ों की लकड़ी से क्यों बनाए जाने चाहिएं? उनके दंड की लंबाई अलग-अलग क्यों होनी चाहिए? भिक्षा याचना करने के समय ‘भवति‘ शब्द को वाक्य का उच्चारण करते समय अलग-अलग स्थानों पर क्यों रखना चाहिए? ये भेद न तो आवश्यक है और न ही लाभदायक है। इसका एकमात्र उत्तर यह है कि यह भदे सहज हिंदू प्रवृत्ति का परिणाम है कि वे अपने ही साथी मानवों से अलग-अलग रहते हैं, जो लोगों के इस विश्वास के कारण है कि वे सभी ईश्वरीय शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों से पैदा हुए हैं।

इसी विश्वास के कारण हिंदूओं की यह भी मूल प्रवृत्ति है कि भेद को नजरअंदाज न किया जाए, बल्कि उस पर बल दिया जाए, उसे पहचाना जाए तथ उसे उजागर किया जाए। जाति के अस्तित्व की ओर उसके विशिष्ट वस्त्रों और नाम से ध्यान आकर्षित किया जाना चाहिए। संप्रदाय के लिए उसकी पहचान होना आवश्यक है। भारत में 92 मत-मतांतर हैं। उनमें से प्रत्येक का अलग चिह्न है। एक दूसरे से पृथक 92 संकेतों की

खोज करना जटिल कार्य है। इसी कारण अति मेधावी व्यक्ति को भी इसमें सिर खपाने की हिम्मत नहीं होगी तथापि, हिंदुओं ने इसे पूरा किया है, जिसे मूर द्वारा अपनी हिंदू पेंथियोन पुस्तक में दिए गए इन तिलकों के सचित्र निरूपण में देखा जा सकता है।

निस्संदेह पृथक्करण तथा अलगाववाद की भावना की बहुत व्यापक और अनियंत्रित अभिव्यक्ति जातिप्रथा है। यह समझ लेना चाहिए कि जाति एक नहीं, अनेक हैं। जातियां हो सकती है। लेकिन एक जाति जैसी कोई चीज नहीं हो सकती। लेकिन सिद्धांत रूप में यह मान लिया जाए कि जातियां होनी चाहिएं, तो कितनी जातियां होनी चाहिएं? मूल रूप से शुरू में केवल चार जातियां थीं। आज कितनी हैं? अनुमान है कि कुल मिलाकर ये दो हजार से कम नहीं हैं। यह तीन हजार भी हो सकती हैं।