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हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत

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इस संदर्भ में चौंकाने वाला यह केवल एक पहलू नहीं है, और भी हैं। जातियों को भी उपजातियों में बांटा गया है। उनकी संख्या अनगणित हैं। ब्राह्मण जातियों की कुल आबादी लगभग डेढ़ करोड़ है। लेकिन ब्राह्मण जाति में भी 1,886 उपजातियां हैं। केवल पंजाब में ही सारस्वत ब्राह्मण 469 उपजातियों में बंटे हैं। पंजाब के कायस्थों की 890 उपजातियां हैं। इसी प्रकार समाज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांटने वाली इस अंतहीन प्रक्रिया के अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। टुकड़ों में बांटने वाली इस प्रक्रिया से सामाजिक जीवन बिल्कुल असंभव सा हो गया हैं। इससे जातियां इतने छोटे समूहों में बंट गई हैं कि उससे बाह्य जातियों के साथ विवाह-संबंध करना बिल्कुल असंभव सा हो गया है। बनियों की कुछ उपजातियों के तो सौ परिवारों से ज्यादा घर नहीं हैं। वे आपस में इतने मिले-जुले हैं कि सगोत्रता के नियमों का उल्लंघन किए बिना उनकी जातियों में शादी-विवाह करना कठिन हो गया है।

यह उल्लेखनीय है कि छोटे-मोटे बहाने ही इन जातियों के उपजातियों में विभाजित होने के कारण हैं। जातियों-उपजातियों के स्थान परिवर्तन, व्यवसाय परिवर्तन, सामाजिक व्यवहार में परिवर्तन, प्रदूषण के कारण परिवर्तन, मालिकाना हक के कारण, परिवर्तन झगड़े के कारण परिवर्तन, धर्म परिवर्तन के कारण से बिखराव आता जाता है। श्री ब्लंट ने हिंदुओं में विद्यमान इस प्रवृत्ति का जीवंत वर्णन करने के लिए कई उदाहरण दिए हैं यहां सभी को प्रस्तुत करना संभव नहीं है। अतः यहां केवल एक उदाहरण ही प्रस्तुत किया जा रहा है, जो यह दर्शाता है कि छोटे-मोटे झगड़े एक जाति को उपजातियों में कैसे बांट देते हैं। जैसा कि श्री ब्लंट ने कहा हैः

‘‘लखनऊ में खटीक नाम की एक उपजाति है, जिसमें तीन गोल अथवा समूह

थे। इन्हें मानिकपुर, जायसवाल तथा दलमान के नाम से जाना जाता था। उनमें

रोटी-बेटी का व्यवहार था ओर वे अपने चौधरी अथवा प्रधान के नेतृत्व में

पंचायत में एक साथ बैठते थे। बीस वर्ष पहले प्रत्येक समूह का एक ही चौधरी

होता था। लेकिन आज जैसवाल समूह के ही तीन चौधरी हैं तथा मानिकपुर

समूह के दो। झगड़े का पहला कारण यह था कि एक औरत (जिसका गोल

नहीं दिया गया है) गली में फल बेचा करती थी। उसके भाई-बंधुओं ने उसे

ऐसा न करने का आदेश दिया क्योंकि ऐसा करना उनकी बिरादरी की शान के

खिलाफ था। औरतों को केवल दुकानों पर बैठकर बिक्री करना चाहिए। वह

और उसका पति हठी थे, और अंत में उसके ही अपने गोल ने उन्हें बिरादरी से

बाहर कर दिया। वैसे दलमान गोल, जो इस कार्यवाही से सहमत नहीं था, उसने

औरत के पति को जाति से बाहर रखने के बजाए 80 रुपए दंड लेकर अपने

वर्ग में ले लिया। झगड़े का दूसरा कारण यह था कि एक आदमी (जिसका

  1. दि कास्ट सिस्टम आफ नदर्न इंडिया, पृ. 51-56