हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत
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खाना बनाते हुए और अकेले बैठकर खाते हुए देखा जा सकता है।’’
कुल मिलाकर पानी पीने के नियम भी ठीक उसी प्रकार हैं, जिस प्रकार पक्का
खाना स्वीकार करने के। लेकिन इसमें प्रवृत्ति कुछ हद तक लचीली है। यह बात उस पात्र पर लागू होती है, जिसमें पानी रखा जाता है। एक उच्च जाति का आदमी निम्न जाति के आदमी से अपना लोटा तो भरवा लेगा, पर उसके लोटे से पानी नहीं पिएगा। फिर, ऊंची जाति वाला किसी भी व्यक्ति को (अस्पृश्यों को छोड़कर) पानी पिलाएगा, और ऐसा वह अपने लोटे से उस पीने वाले के लोटे में पानी डालकर करेगा। स्टेशनों पर रेल-यात्रियों को पानी की आपूर्ति किए जाने के लिए रखे हुए सभी आदमी बढ़ई, बारी, भड़भूजे, हलवाई, कुम्हार तथा नाई हैं। निस्संदेह कुछ उच्च जातियों के भी हैं।
धूम्रपान के नियम तो और भी सख्त हैं। बहुधा देखा गया है कि कोई आदमी अपनी बिरादरी के लोगों के अलावा किसी और के साथ धूम्रपान नहीं करता। इसका कारण बहुत ही स्पष्ट है कि धूम्रपान में सामान्यतः हुक्के का प्रयोग किया जाता है और इसमें ज्यादा नजदीकी संबंध निहित होते हैं, यहां तक कि खाने से भी ज्यादा। यह नियम वास्तव में इतना कठोर है कि इस तथ्य के आधार पर से भी ज्यादा। यह नियम वास्तव में इतना कठोर है कि इस तथ्य के आधार पर जाट, अहीर और गुजर एक-दूसरे के ज्यादा सगे-संबंधी माने जाते हैं, अतः वे एक-दूसरे के साथ धूम्रपान कर सकते हैं। कुछ जातियां, उदाहरण के लिए कायस्थ नारियल तथा सामान्य तरीके से धूम्रपान करने के बीच अंतर रखते हैं। नारियल द्वारा धूम्रपान करने में नलकी के चारों ओर हाथ गोल करके बंद कर दिया जाता है और नली को मुंह में डाले बिना धूम्रपान किया जाता है। पात्रों के बारे में कहने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके भी नियम निर्धारित हैं कि किस प्रकार के बर्तन बनाए जाने चाहिएं। लेकिन ये नियम सामाजिक होने के बजाए धार्मिक ज्यादा हैं। हिंदुओं को मिश्र धातु या पीतल के बर्तनों का उपयोग करना चाहिए हालांकि मिश्र धातु का उपयोग अनेक तथा छोटी-छोटी निषेधज्ञाओं से सीमित है और यदि यह पात्र अशुद्ध हो जाते हैं, तो उनको शुद्ध करने का तरीका केवल यह होता है कि उन्हें पुनः ढाला जाए। बर्तन झूठे हो जाने के डर के कारण हर आदमी के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह अपने उपयोग के लिए कुछ निजी बर्तन रखे। इनमें कम से कम एक लोटा (पीने का पात्र), बटलाई तथा थाली होनी चाहिए। उच्च जाति के ग्रामीण लोग एक कटोरा तथा गागर इसमें और जोड़ देते हैं। दावत के लिए एक ही जाति के लोग सामान्यतः सभी प्रकार के बर्तन बड़ी मात्रा में रखते है, जिन्हें वे मेजबान को बरतने के लिए देते हैं। इन बर्तनों को दंड-स्वरूप प्राप्त हुए धन से खरीदा जाता है, और यह सभी की साझा संपत्ति होती है।’’