124 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यक्ति गुण, स्वभाव और प्राकृतिक रूप से समान है या नहीं। यदि प्राकृतिक और स्वभावगत असमानता रहती है, तो चलो ठीक है फिर तो यह सिद्धांत ही कचरा है कि जन्म से ही सभी भौतिक और प्रवृत्ति के आधार पर समान होते हैं। वास्तव में हिंदू समाज-व्यवस्था इस मत के प्रति उदासीन है। यह इसके नैतिक सिद्धांत के प्रति उतनी ही उदासीन है। यह इस बात को मानने से इंकार करती है कि मनुष्य अलग-अलग हैसियत में क्षमता तथा स्वभाव के दृष्टिकोण से भिन्न होते हुए भी मानव कहलाने के अधिकारी हैं और उन्हें सम्मान मिलना चाहिए तथा समाज की भलाई इसी में हो सकती है कि यदि वह अपने संगठन को इस तरह से योजनाबद्ध करे, भले ही उनकी शक्तियां छोटी या बड़ी हों, इसके सभी सदस्यों के सामन रूप से मौका मिलना चाहिए कि वे अपनी-अपनी शक्तियों का सर्वोत्तम उपयोग व प्रदर्शन करें। परिस्थितियों, संस्थाओं तथा जीवन के तौर-तरीकों को यह समाज-व्यवस्था अनुमति नहीं देगी। यह समतावादी परंपरा के विरुद्ध है।
III
यदि हिंदू समाज-व्यवस्था समानता तथा भाई-चारे पर आधारित नहीं है, तो वह कौन से सिद्धांतों पर टिकी हुई है? इस प्रश्न का केवल एक ही उत्तर है। कुछ ही लोग यह समझने में समर्थ होंगे कि वे क्या हैं, लेकिन उनकी प्रकृति और हिंदू समाज पर उनके प्रभाव के बारे में कोई संशय नहीं है। हिंदू समाज-व्यवस्था का पोषण तीन सिद्धांतों द्वारा होता है इनमें सबसे पहला सिद्धांत है, सीढ़ी भेदभाव का व्यवहार। इस चरणबद्ध असमानता का यह सिद्धांत मूल सिद्धांत और विचार से परे है। चारों वर्ण सपाट धारातल पर नहीं रचे गए हैं, जो भिन्न होते हुए भी समान हों। ये सीढ़ीनुम्मा धारातल वाले हैं। ये न केवल भिन्न-भिन्न हैं, वरन् स्थिति में भी असमान हैं और एक दूसरे के ऊपर टिके हुए हैं मनु। की योजनानुसार ब्राह्मण को पहले वर्ण में रखा जाता है उसके नीचे का क्षत्रिय वर्ण होता है। क्षत्रिय से निचले वर्ण का वैश्य होता है वैश्य से निचला वर्ण शूद्र होता है तथा शूद्र से अगला वर्ण जाति शूद्र या अस्पृश्य का होता है। इन वर्गों के बीच अग्रता का यह क्रम मात्र परंपरागत नहीं है। यह आध्यात्मिक, नैतिक तथा वैधानिक हैं। जीवन का कोई भी हिस्सा नहींहै, जो वर्गीकृत असमानता के इस सिद्धांत से अछूता हो।
इसके पक्ष में मनुस्मृति के अनेक दृष्टांत दिए जा सकते हैं। मैं इस बात को सिद्ध करने के लिए चार उदाहरण दूंगा। ये है। दासता का नियम, विवाह का नियम, दंड का नियम और संस्कार का नियम तथा संन्यास का नियम। हिंदू ‘नियम दासता को एक कानूनी प्रथा मानते हैं मनुस्मृति में तो सात प्रकार की दासता की उल्लेख है।