हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत
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नारदस्मृति में दासता की पंद्रह श्रेणियां मिलती हैं। दासों की संख्या का यह अंतर तथा वे वर्ग जिनके अंतर्गत ये आते हैं, महत्वपूर्ण नहीं हैं महत्वपूर्ण तो यह जानना है कि कौन किसको दास बना सकता है। इस संबंध में नारदस्मृति तथा याज्ञवल्कक्यस्मृति से निम्नांकित उद्धरण दिए जा सकते हैंः
नारदस्मृतिः 5.39 चारों वर्णों के उल्टे क्रम में दासता की कोई व्यवस्था नहीं
है, सिवाय इसके जब कोई आदमी अपनी जाति के लिए निर्धारित कर्तव्यों
की अवहेलना करता है दासता (इस मामले में) एक पत्नी की स्थिति जैसी
होती है।
याज्ञवल्क्यस्मृतिः 16.183 (2) दासता वर्णों के अवरोही क्रम में होती है,
आरोही क्रम में नहीं।
दासता के मान्यता प्रदान किया जाना बहुत बुरी बात थी लेकिन यदि दासता के नियम को अपने ही हाल पर छोड़ दिया गया होता, तो इसका कम से कम एक परिणाम तो अच्छा होता। इससे समानता को बल मिलता। जाति परंपरा नष्ट हो गई होती, क्योंकि इसके अंतर्गत एक ब्राह्मण अस्पृश्यों का दास बन सकता था तथा अस्पृश्य ब्राह्मणों के मालिक बन सकते थे। लेकिन यह देखा गया कि बेरोक-टोक दासता का एक समतावादी सिद्धांत था और इसे निरस्त करने का प्रयास किया गया। अतः मनु तथा उनके उत्तरवर्तियों ने इस प्रकार की दासता को मान्यता प्रदान की कि यह वर्ण-प्रथा के विपरीत दिशा में नहीं होगी इसका तात्पर्य यह है कि एक ब्राह्मण दूसरे ब्राह्मण का दास बन सकता है लेकिन वह किसी दूसरे वर्ण के आदमी का दास नहीं बन सकता अर्थात् वह किसी क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र या अतिशूद्र का दास नहीं बन सकता। दूसरी ओर, ब्राह्मण या क्षत्रिय को नहीं। एक शूद्र किसी दूसरे शूद्र तथा अतिशूद्र को अपना दास बना सकता है, लेकिन किसी ब्राह्मण क्षत्रिय या वैश्य को नहीं। एक अतिशूद्र किसी दूसरे अतिशूद्र को ही अपना दास बना सकता है, लेकिन किसी ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र को नहीं।
वर्गीकृत असमानता के इस सिद्धांत का एक और उदाहरण शादी-विवाह के नियमों में देखा जा सकता है। मनु कहता हैः
3.12 द्विजों की पहली शादी के लिए उसी जाति की स्त्री की संस्तुति की
जाती है, परंतु ऐसे लोगों के लिए, जिन्हें किसी कारण से पुनर्निवाह करना
हो, उसमें वर्णों के सीधे नीचे वर्ण की स्त्रियों को वरीयता दी जाती है।