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हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसके मूलभूत सिद्धांत

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120.76 ब्राह्मण के इन छह कार्यों में से ये तीन कार्य उसकी जीविका से

संबधित हैं, यज्ञ करने में सहायता कराना, वेदों का अध्यापन तथा सदाचारी

व्यक्ति से दान प्राप्त करना।

10.77 ये तीन कार्य ब्राह्मण के लिए सुरक्षित हैं, और उन्हें क्षत्रिय नहीं कर

सकता, वेदों का अघ्यापन, यज्ञ कराना तथा तीसरा, दान स्वीकार करना।

10.78 ये उपरोक्त तीनों कार्य (निर्धारित कानून के अनुसार) वैश्य के लिए

निषिद्ध हैं, क्योंकि लोकाधिपति मनु ने क्षत्रिय और वैश्य, दोनों वर्गों के लिए

इन कार्यों को निर्धारित नहीं किया है।

10.79 क्षत्रिय की जीविका के साधन हैं, जैसे शस्त्र धारण करना, या तो

हमला करने के लिए या हाथ से चलाने वाले शस्त्र वैश्य के लिए व्यापार,

पशु पालन तथा कृषि_ लेकिन अपने अग्रिम जीवन को सफल बनाने के लिए

भिक्षा देना, अध्ययन करना तथा यज्ञ कराना दोनों के कर्म हैं।

प्रत्येक सदस्य उस वर्ण-विशेष के लिए निर्धारित व्यापार को ही करेगा, जिस वर्ण का वह है। इसमें व्यक्तिगत चयन, व्यक्तिगत रूझान का कोई स्थान नहीं है। हिंदू समाज-व्यवस्था से बंधा हुआ है। यह एक ऐसा कठोर नियम है कि इससे बचा नहीं जा सकता।

यह सिद्धांत व्यवसाय के निर्धारण तक ही सीमित नहीं रह जाता। यह कई व्यवसायों को उनके सम्मान की दृष्टि से श्रेणीद्ध भी करता है। मनु कहता हैः

10.80 जीविकोपार्जन के लिए अनेक व्यवसायों में से ब्राह्मणों, क्षत्रियों,

वैश्यों के लिए सबसे अधिक प्रशंसनीय व्यवसाय क्रमशः वेदों को पढ़ना व

पढ़ाना लोगों की रक्षा करना तथा व्यापार करना है।

हिंदू समाज-व्यवस्था का तीसरा सिद्धांत जिस पर हिंदू समाज-व्यवस्था आधारित है, वह लोगों को उनके संबंधित वर्णों के खूंटे से बांधना है। यह कोई विचित्र बात नहीं है, कि हिंदू समाज-व्यवस्था वर्णों को स्वीकारती है। हर जगह वर्ग हैं और कोई भी समाज वर्गहीन समाज नहीं है। परिवार, दल क्लब, राजनीतिक दल, आपराधिक षड्यंत्रों में संलग्न अवैध गिरोह, लोगों को लूटने वाले व्यावसायिक निगम संसार के सभी भागों में तथा सभी समाजों में पाए जाते हैं। स्वतंत्र व्यवस्था भी वर्गों से छुटकारा नहीं पा सकती। स्वतंत्र समाज व्यवस्था का उद्देश्य व लक्ष्य पृथक्करण व अलगाव को रोकना होता है। जो वर्गों द्वारा अनुकरण करने के लिए एक आदर्श स्थिति मानी जाती है। चूंकि जो वर्ग पृथक्करण और अलगाव नहीं अपनाते हैं, वे एक दूसरे के प्रति अपने अपने संबंधों में असामाजिक माने जाते हैं। पृथक्करण और अलगाव उन्हें एक दूसरे के प्रति असामाजिक तथा विरोधी बना देते हैं। पृथक्करण से वर्ग-चेतना के संबंध में कठोरता आ जाती है,