132 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
सामाजिक जीवन लाभबंद हो जाता है और स्वार्थी तत्व आदर्शवादी तत्वों पर छा जाते हैं। पृथक्करण से जीवन गतिहीन हो जाता है, विशेषाधिकार-युक्त और गैर-विशेषाधिकार युक्त मालिक तथा नौकर के बीच अलगाव बना रहता है।
किसी समाज में वर्गों का होना स्वतंत्र समाज-व्यवस्था के लिए उतना प्रतिकूल नहीं है, जितना कि पृथक्करण और अलगाव की भावना। स्वतंत्र समाज-व्यवस्था के अंतर्गत समाज में समरसता की धारा प्रवाहित रहती है। यह केवल तभी संभव है, जब वर्गों को सामान्य हितों, उत्तरदायित्वों में भागीदारी करने का अवसर मिले और सामान्य रूप से जीवन मूल्यों का अधिकार मिले, यदि चारों ओर स्वतंत्र व्यवस्था हो जाए जिसके अंतर्गत लेन-देन के समान अवसर उपलब्ध हों, तो ऐसे समाज संबंधों से रीति रिवाज, मानसिक दृष्टिकोण सजग तथा व्यापक होता है और इसके लिए काल ही नहीं, विचारों की गतिशीलता की आवश्यकता है। हिंदू समाज-व्यवस्था के बारे में जो चीज ध्यान आकर्षित करती है, वह हिंदू समाज के विभिन्न वर्गों के बीच आंतरिक विवाद पर प्रतिबंध रोक है इसके अंतर्गत दूसरी जाति के साथ भोजन करने और अंतर्जातीय विवाह पर प्रतिबंध है। लेकिन मनु तो सामान्य सामाजिक संसर्ग तक का निषेध करता है। मनु के अनुसारः
4.244 वंश को उन्नत करने की इच्छा करने वाला सर्वदा बड़ों के साथ
संबंध करे और अपने से नीचों को छोड़ दे।
4.245 बड़ों के साथ संबंध करता हुआ और नीचों का त्याग करता हुआ
ब्राह्मण श्रेष्ठता को पाता है। इसके विरुद्ध आचरण करता हुआ शूद्रता को
पाता है।
4.79 उसे बड़े अपराधों के लिए जाति से निष्कासित पतित व्यक्ति, चांडाल,
पुल्कस, मूर्ख धन के कारण अभिमानी, अंतयज और अन्त्यावसायी के साथ
एक ही वृक्ष की छांव में नहीं बैठना चाहिए।
हिंदू समाज-व्यवस्था भाईचारे के खिलाफ है इसमें समानता के सिद्धांत को कोई स्थान नहीं है। समानता को मान्यता प्रदान करने के बजाय यह असमानता को अपना अधिकारिक सिद्धांत बनाती है। स्वतंत्रता के बारे में स्थिति यह है कि व्यवसाय के चयन के बारे में कोई स्वतंत्रता नहीं है। प्रत्येक का उसके लिए निर्धारित अपना व्यवसाय है। उसे तो बस वही करते रहना है। जहां तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सवाल है, यह स्वतंत्रता है, लेकिन यह केवल उन्हीं लोगों के लिए है, जो समाज-व्यवस्था के पक्षधर हैं। ऐसी स्वतंत्रता नहीं है जिसके बारे में वाल्टेयर ने कहा था, आप जो कुछ भी कहते हैं मैं उसे पूरी तरह से अस्वीकृत करता हूं और मैं मरते दम तक ऐसा कहने के इस अधिकार की रक्षा करूंगा। यह उस समय स्पष्ट हो जाता है, जब मनु तर्क-शास्त्र तथा न्याय के बारे में कहता हैः