हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसकी अनोखी विशेषताएं
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देने का अधिकार होगा और दंडित व्यक्ति न्यायालय की शरण नहीं ले सकेगा। ख्2, यदि उसके धार्मिक कर्तव्यों के निष्पादन के लिए आवश्यक हुआ तो वह किसी सामान्य जन (जैसे शूद्र) की संपत्ति पर अधिकार जमा सकता है और उसके लिए न तो वह उसे क्षतिपूर्ति करेगा और न ही उससे पीडि़त न्यायालय की शरण ले सकेगा। ख्3, यदि वह छिपे हुए खजाने को ढूंढ लेता है तो वह उसे पूरा ही अपने अधिकार में ले लेगा ख्4, और राजा को उसका सामान्य हिस्सा भी नहीं देगा, क्योंकि वह सबका मालिक है तथा दूसरे के द्वारा खोजे जाने पर वह उसका आधा भाग ले लेगा। वह किसी असाघ्य रोग से मृत्यु को प्राप्त हुए राजा द्वारा वैधानिक जुर्माने से एकत्रित की गई संपूर्ण राशि का हकदार है। वह कराधान से परे है वह राजा को इस बात के लिए बाध्य कर सकता है कि वह उसे रोजाना भोजन उपलब्ध कराए और राजा यह देखे कि वह भूखा न मरे। उसकी संपत्ति राज्याधिकार में लिए जाने वाले कानून से मुक्त है।
हिंदू समाज-व्यवस्था का महामानव संकट के दौर में व्यवसाय के मामले में किसी भी नियम में आबद्ध नहीं है, मनु कहता हैः
10.81 ब्राह्मण यदि अपने कर्म से जीवन-निर्वाह नहीं कर सके, तो क्षत्रिय
का कर्म करता हुआ जीवन-निर्वाह करे, क्योंकि क्षत्रिय कर्म उसका समीपवर्ती
है।
10.82 दोनों (ब्राह्मण कर्म तथा क्षत्रिय कर्म) से जीवन-निर्वाह नहीं कर
सकता हुआ ब्राह्मण किस प्रकार रहे? ऐसा संदेह उपस्थित हो जाए तो वैश्य
के कर्म, खेती, गो-पालन और व्यापार से जीविका करे।
10.83 वैश्यावृत्ति से जीविका करता हुआ भी ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय हिंसा
प्रधान पराधीन कृषि कर्म प्रत्यनपूर्वक छोड़ दे।
10.84 कुछ लोक कृषि को उत्तम कर्म मानते हैं किन्तु वह जीविका सज्जनों
से निंदित है, क्योंकि लोहे के मुख वाला काष्ठ अर्थात् हल भूमि तथा भूमि
में स्थित जीवों को मार डालता है।
मनुस्मृति 3.12.13 यह विशेषाधिकार भारत में न्यायालयों द्वारा मान्यता प्राप्त है।
मनुस्मृति 11.31 यह विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया गया है।
मनुस्मृति 11.32 यह विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया गया है।
मनुस्मृति 11.37 यह विशेषाधिकार अब नहीं है।
मनुस्मृति 8.38.
मनुस्मृति 9.323.
मनुस्मृति 7.133.
मनुस्मृति 7.134.
मनुस्मृति 9.189