3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 155

140 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

10.85 जीविका के अभाव से धर्म की निष्ठा को छोड़ते हुए ब्राह्मण तथा

क्षत्रिय को कुछ त्याज्य वस्तुओं को छोड़कर वैश्यों द्वारा बेची जाने वाली

धनवर्द्धक शेष वस्तुओं को बेचना चाहिए।

10.102 आपत्ति में पड़ा हुआ ब्राह्मण सबसे दान ग्रहण करे, क्योंकि आपत्ति

में पड़ा हुआ पवित्र दूषित होता है, यह शास्त्र संगत नहीं होता है।

10.103 निंदितों को अध्यापन कराने से, यज्ञ कराने से और उनका दिया

हुआ दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं होता, क्योंकि वे अग्नि तथा पानी

के समान पवित्र है।

महामानव के विशेषाधिकारों के बावजूद उनकी सामान्यजन के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं है। वास्तव में महामानव की सामान्यजन के प्रति कोई जवाबदेही नहीं।

वह सामान्य जन के उत्थान के लिए दान करने हेतु बाघ्य नहीं है। दूसरी ओर दान स्वीकार करना महामानव का एकाधिकार है। किसी और व्यक्ति द्वारा दान लिया जाना पाप है। सामान्य जन (शूद्र) जो महामानव की सेवा के लिए ही पैदा होता है, सेवक के प्रति उसमें सद्भाव होना आवश्यक नहीं। वह उसे अच्छा भोजन, अच्छे कपड़े तथा अच्छा निवास-स्थान देने के लिए बाध्य नहीं है, इस संबंध में मनु द्वारा निर्धारित उसके कर्तव्य निम्नांकित हैः

10.124 शूद्र की क्षमता, उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर

लोगों की संख्या को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक

संपत्ति से उचित वेतन दें।

10.125 शूद्र को जूठा भोजन, पुराने वस्त्र, अन्न का पुआल तथा पुराने बर्तन

आदि देने चाहिए।

सामान्य जन की उन्नति महामानव की श्रेष्ठता के विरुद्ध है। महामानव को प्रसन्न, संतुष्ट तथा सुरक्षित व निर्भय रखने की दृष्टि से हिंदू समाज-व्यवस्था व्यक्ति को निरंतर पतन की स्थिति में रखने के लिए विशेष ध्यान देती है।

मनु इस बात पर जोर देता है कि शूद्र को सेवा के सिवाय और कुछ नहीं करना चाहिएः

10.122 यह ब्राह्मण की सेवा करे।

10.122 ब्राह्मण की सेवा द्वारा जीवन-निर्वाह नहीं होने से जीविका को चाहने

वाला शूद्र क्षत्रिय अथवा धनिक वैश्य की सेवा करता हुआ जीवन-निर्वाह करे।

1.91 ब्रह्मा ने शूद्र के लिए जो एक सबसे प्रमुख कार्य सौंपा है, वह है

बिना किसी उपेक्षा भाव के उक्त तीनों वर्णों की सेवा करना।

10.129 शूद्र धन संचय करने की स्थिति में हो, फिर भी ऐसा न करे क्योंकि

जो शूद्र धन संचय करता है, वह ब्राह्मण को देख पहुंचाता है।