हिंदू समाज-व्यवस्थाः इसकी अनोखी विशेषताएं
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सामान्य जन को विद्यार्जन की अनुमति नहीं है इस संबंध में मनु के निम्नांकित निर्देश हैंः
1.88 वेदों का अध्ययन करने तथा वेदों की शिक्षा देने का कार्य सृष्टि ने
ब्राह्मणों को सौंपा है।
1.89 क्षत्रियों को उसने (सृष्टा) ने आदेश दिया है कि वे वेदों का अध्ययन
करें।
2.116 जो गुरू की आज्ञा के बिना ही वेदों का ज्ञान ग्रहण करता है वह
ब्रह्म की चोरी करने का दोषी होकर नकरगामी होता है।
4.99 द्विज शूद्र की उपस्थिति में वेद का अध्ययन न करे।
9.18 स्त्रियों का वेदों के श्लोकों से कोई सरोकार नहीं है।
11.198 यदि किसी द्विज ने (अनुचित रूप से) वेदों का रहस्योद्घाटन
किया है (अर्थात् शूद्रों तथा स्त्रियों को) तो वह (पाप करता है) एक वर्ष
जौ का आहार करके अपने पाप का प्रायश्चित करता है।
इन उदाहरणों में तीन विशेष प्रस्ताव दिए गए है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य भी वेदाध्ययन कर सकते हैं। इनमें से भी केवल ब्राह्मण को ही वेदों के अध्यापन अधिकार है लेकिन शूद्र को तो न केवल वेदों का अध्ययन करने की मनाही हे वरन् उसे तो उन्हें किसी के द्वारा पढ़े जाने पर सुनने की भी अनुमति नहीं दी गई।
मनु के उत्तराधिकारियों ने शूद्र द्वारा वेदाध्ययन करने के लिए उसे कठोर दंड वाले अपराध की श्रेणी में रखा। उदाहरण के लिए ऋषि गौतम कहता हैः
3.4 यदि शूद्र इरादतन याद करने के उद्देश्य से वेद सुनता है तो उसके
कानों में पिछला हुआ लाख और जस्ता भर देना चाहिए, यदि वह वेद का
उच्चारण करता है तो उसकी जीभ काट देनी चाहिए और यदि वह वेद पर
अधिकार प्राप्त कर लेता है तो उसके शरीर के टुकड़े कर देना चाहिएं।
कात्यायन के भी यही विचार हैंः
सामान्य जन (शूद्र) को दीक्षा-संस्कार की भी अनुमति नहीं है दूसरे जन्म में ही व्यक्ति विशेष का नैतिक तथा भौतिक उन्नयन संभव हो पाता है। सामान्य जन को तो गरिमापूर्ण नाम रखने का भी अधिकार नहीं है।
मनु के अनुसारः
2.30 पिता को बच्चे के जन्म के बाद दसवें अथवा बारहवें दिन, अथवा
शुभ ग्रह के अवसर पर अथवा शुभ मुहुर्त पर अथवा शुभ तिथि पर नामध्येय
(बच्चे का नामकरण संस्कार) करना चाहिए।