3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 157

142 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

1.31 ब्राह्मण के नाम का पहला भाग शुभ सूचक होना चाहिए, क्षत्रिय के

नाम का शक्ति के साथ संबंध हो और वैश्य का संपत्ति के साथ, परंतु शूद्र

के नाम का पहला भाग कोई ऐसा हो जो घृणा व्यक्त करे।

2.32 ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा शब्द हो जो प्रसन्नता व्यक्त करे, क्षत्रिय

का नाम रक्षा व्यक्त करे, वैश्य का समृद्धि और शूद्र का सेवा व्यक्त करे।

महामानव शूद्र के श्रेष्ठ नाम को सहन नहीं कर सकेगा। वह वास्तविकता तथा नाम दोनों दृष्टियों से निंदनीय होगा।

हिंदू का जीवन आश्रमों में बंटा हुआ है। प्रथम आश्रम को ब्रह्मचार्य कहते है, जो विद्यार्थी काल होता है। दूसरे को गृहस्थाश्रम कहा जाता है, जिसे वैवाहिक अवस्था कहते हैं। तीसरे को वानप्रस्थ कहते हैं जो संसारिक जीवन से अनाशक्ति काल माना जाता है। चौथे काल को संन्यास कहा जाता है जो सांसरिक झंझटों से परू तरह मुक्त होने की अवस्था और लौकिक मृत्यु के बराबर होती है, सामान्य व्यक्ति को संन्यासी बनने का अधिकार नहीं है। समझना कठिन है कि ऐसा क्यों हैं? प्रत्यक्षतः महामानव के लाभार्थ यह रचना रची गई। शूद्र संन्यासी बनने के बाद महामानव की सेवा करना बंद कर देगा। शूद्र संन्यासी बनकर ईश्वर या ब्रह्मा के समीप पहुंच जाएगा जो कि महामानव के विशेषाधिकारों का अतिक्रमण होगा।

मनुस्मृति से लिए गए उद्धरण यह सिद्ध करते हैं कि हिंदू समाज-व्यवस्था स्पष्ट तौर पर महामानव के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित की गई है, इसमें हर चीज महामानव के लिए बनाई गई है। महामानव ब्राह्मण है और सामान्य जन शूद्र। महामानव को अधिकार प्राप्त है, पर उसके कर्तव्य कुछ नहीं हैं। हर चीज महामानव की इच्छा पर निर्भर है। हर चीज उसी के हितों को ध्यान में रखकर निर्धारित की जानी होगी। इस विशेषता का विपरीत पक्ष आम आदमी का पतन है। महामानव की तुलना में सामान्य जन को स्वतंत्रता, संपत्ति या प्रसन्नता की आशा का कोई अधिकार नहीं है उसे महामानव के जीवन-निर्वाह तथा मान मर्यादा के लिए हर चीज का परित्याग करने को तैयार रहना चाहिए। हिंदू समाज-व्यवस्था के अनुसार ऐसा परित्याग सामान्य जन को स्वेच्छा से करना चाहिए। वास्तव में यह इस बात को मस्तिष्क में बैठा देती है कि आम आदमी को अपना सर्वश्रेष्ठ कर्तव्य समझकर महामानव के हित में परित्याग करने के लिए सदैव तैयार करना चाहिए।

क्या इसमें कोई संदेह के कि जरथूस्त मनु के लिए नया नाम है और दस स्पेक जरथूस्त मनुस्मृति का नया संस्करण है?

यदि मनु तथा नीत्शे के बीच कोई अंतर है तो वह इस बात में निहित है कि तीत्शे मानव का नया वर्ग सृजित करने में वास्तविक अभिरुचि रखता था, जो मानव