3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 159

144 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

पहली तरकीब तो यह है कि समाज-व्यवस्था को बनाए रखने की जिम्मेदारी राजा की है। मनु का इस संबंध में स्पष्ट मत हैः

8.410 राजा प्रत्येक वैश्व को व्यापार अथवा पैसा उधार देने की अथवा

खेती करने की अथवा पशु-पालन की और शूद्र व्यक्ति को द्विज की सेवा

करने की आज्ञा दे।

8.418 पूर्ण रूप से जाग्रत तथा सचेत होकर राजा आदेश दे कि वैश्यों तथा

शूद्र अपने-अपने कर्तव्यों का पालन करें, क्योंकि जब ये लोग अपने कर्तव्यों

का पालन करना छोड़ देते हैं, तब सारा संसार भ्रम में पड़ जाता है।

मनु इस संबंध में राजा के मात्र कर्तव्य निरूपण तक ही सीमित नहीं रहता। वह यह सुनिश्चित करना चाहता है कि स्थापित व्यवस्था को राजा हर समय सुरक्षित बनाए रखने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करे। अतः आगे मनु दो उपबंधों की व्यवस्था कर देता है, पहला उपबंध तो यह है कि राजा द्वारा स्थापित व्यवस्था को बनाए रखने में विफल रहने पर इसे अपराध माना जाए जिसके लिए राजा पर अभियोग चलाया जाए तथा सामान्य घोर अपराधी की तरह उसे दंड दिया जाए। मनुस्मृति से लिए गए निम्नलिखित उद्धरण से यह स्पष्ट हैः

8.335 यदि पिता, शिक्षक, मित्र, माता, पत्नी, पुत्र, घरेलू पुरोहित अपने-अपने

कर्तव्य का दृढ़ता व सच्चाई के साथ निष्पादित नहीं करते हैं तो इनमें से

किसी को भी राजा द्वारा बिना दंड के नहीं छोडा़ जाना चाहिए।

8.336 जिस अपराध में साधारण व्यक्ति एक पण से दंडनीय है, उसी अपराध

से लिए राजा सहस्र पण से दंडनीय है, ऐसा शास्त्र का निर्णय है। उसे यह

दंड-राशि पुरोहित को या नदी को भेंट करनी चाहिए।

स्थापित व्यवस्था के प्रति लापरवाह या उसका विरोध करने वाले राजा के लिए मनु द्वारा किया गया दूसरा प्रावधान यह है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य राजा के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह कर सकते हैं।

8.348 यदि किसी द्विजातियों के कर्तव्य को बलपूर्वक बाधित किया जाता है या

उन पर विपत्ति आती है या उनके दुर्दिन आते हैं तो वे शस्त्र उठा सकते हैं।

स्वाभाविक है, क्योंकि ऊपर वाले ये तीन उच्च वर्णों ही है_ जिन्हें इस पद्धति को बनाए रखने में लाभ है। लेमिन मान लिया जाए? इस संदर्भ में मनु ब्राह्मणों को यह अधिकार देता है कि वे सभी को, विशेषकर क्षत्रियों को दंड दें।

11.31 नियमों को अच्छी तरह जानने वाले ब्राह्मण को किसी दुखदायी आघात

की स्थिति में राजा से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि वह अपनी

शक्ति द्वारा ही उस व्यक्ति को दंड दे सकता है, जो उसे आघात पहुंचाता है।