3. हिंदू समाज व्यवस्था : इसकी अनोखी विशेषताएं - Page 161

146 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

निर्धारित कर दिया गया है इन दोनों के बीच कोई असमानता नहीं है, अतः शिकायत पैदा होने की कोई संभावना नहीं है। इसमें निम्न वर्गों के लिए शिक्षा की मनाही है। परिणाम यह है कि कोई भी अपनी निम्नता के प्रति सजग नहीं है। वे तो बस इतना जानते हैं कि निम्नावस्था के लिए कोई जिम्मेदार नहीं हैं यह तो भाग्य में ही लिखा है। यह भी मान लिया जाए कि शिकायत है, शिकायत के प्रति जागरूकता भी है, तब भी निम्न वर्ग हिंदू समाज-व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह नहीं कर सकते, क्योंकि हिंदू समाज-व्यवस्था सामान्य जन को हथियारों के उपयोग का अधिकार नहीं देती। मुसलमान या नाजियों जैसी समाज व्यवस्थाएं इसके बिल्कुल विपरीत हैं। वे सभी को समान अवसर प्रदान करती है। इनमें ज्ञानार्जन की स्वतंत्रता है। उनमें उन्हें हथियारों के उपयोग करने की स्वतंत्रता है और वे बल तथा हिंसा का सहारा लेकर विद्रोह को दबाने का कार्य स्वयं कर सकते हैं। अवसर की स्वतंत्रता न देना, ज्ञानार्जन की स्वतंत्रता न देना, हथियारों के उपयोग का अधिकार न देना सबसे बड़ी निर्दयता है। इसका परिणाम यह है कि मनु मानव के हाथ-पांव काट लेता है और उसे नपुंसक बना देता है हिंदू समाज-व्यवस्था को ऐसा करने पर कोई शर्म नहीं है। तथापि, इसने दो उपलब्धियां हासिल की हैं। यह सर्वाधिक प्रभावी सिद्ध हुई हैं, हालांकि स्थापित व्यवस्था को परिरक्षित करने की यह सबसे शर्मनाक विधि है दूसरे, मानवता का गला दबाने के सर्वाधिक अमानवीय तरीकों व साधनों का उपयोग करने के बावजूद यह हिंदुओं को बहुत ही मानवीय लोक होने की प्रतिष्ठा प्रदान करती है। वास्तव में नाजियों को हिंदुओं से बहुत कुछ सीखना था। यदि उन्होंने जनता को दबाने की हिंदूवादी तकनीक अपनाई होती, जो वे बिना किसी खुली बर्बरता के यहूदियों को कुचलने में सफल हो गए होते तथा स्वयं को मानवता का अवतार भी सिद्ध कर सकते थे।

हिंदू समाज-व्यवस्था की तीसरी निराली विशेषता यह है कि यह स्वयं ईश्वर द्वारा बनाई गई दैवीय व्यवस्था है। चूंकि यह पवित्र व्यवस्था है, अतः इसका निराकरण, संशोधन, यहां तक की इसकी समीक्षा भी नहीं की जा सकती। हिंदू समाज-व्यवस्था के दैवी चरित्र के बारे में किसी भी संदेह में निवारण के लिए भगवत्गीता तथा मनुस्मृति के निम्नांकित श्लोकों की ओर ध्यान आकर्षित किया जाता है। हिंदुओं के ईश्वरों में से एक ईश्वर श्रीकृष्ण जिसका शब्द की भगवत्गीता है, कहता हैः

4.13 गुण और कर्मों के विभाग में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र मेरे

द्वारा रचे गए हैं और इनकी रचना मेरे द्वारा ही की गई है।

18.41-44 हे परंतप! ब्राह्मण-क्षत्रिय, वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म-स्वभाव

से उत्पन्न हुए गुण विभक्त किए गए हैं। अंतःकरण का निग्रह, इंद्रियों का

दमन, बाहर-भीतर की शुद्धि, धर्म के लिए कष्ट सहन करना, क्षमा-भाव,

मन, इंद्रियों और शरीर की सरलता, आस्तिक बुद्धि-शास्त्र विषयक ज्ञान