1. हिंदुत्व के प्रतीक - Page 172

हिंदुत्व के प्रतीक

157

मक्खन, चीनी, चावल लेते हैं और अनेक प्रकार के परिरक्षित पदार्थ लेते हैं, वे फल-सब्जियों का बहुत अधिक उपयोग करते हैं तथा अपने खाने में हरा साग लेते हैं, जहां कहीं भी वे रहते हैं, उनके फलों के बगीचे तथा अनेक जलाशय होते हैं, जहां स्त्री तथा पुरुष दिन में दो बार नहाते हैं और नहाने के बाद कहते हैं कि वे अब तक किए गए सभी पापों से मुक्त हो गए हैं। हमारी स्त्रियों की तरह से बनिया लोग लम्बे-लम्बे बाल रखते हैं, और सिर पर चुटिया बनाकर उसमें गांठ लगाते हैं और उस पर पगड़ी पहनते हैं ताकि वे उन्हें एक साथ बंधा हुआ रख सकें। वे अपने बालों में फूल तथा अन्य सुगंधित चीजें लगाते हैं।

वे केसर तथा अन्य इत्रों वाले सुगंधित केसर और चंदन का लेप करते हैं। वे बहुत ही कामुक होते हैं। वे सूती तथा सिल्क का लम्बा कुर्ता और चमड़े के बने नुकीले तथा चमकीले कीमती जूते पहनते हैंः उनमें कुछ लोग रेशमी और जरीदार कपड़े की छोटी-छोटी बंड़ी पहनते हैं। वे सोने तथा चांदी से सज्जित चाकुओं को छोड़कर हाथियार नहीं रखते और ऐसा दो कारणों से है, पहला यह कि वे ऐसे लोगे हैं जो हथियार का बहुत ही कम उपयोग करते हैं_ तथा दूसरा कारण यह है कि बीढ़ उनकी रक्षा करते हैं।

‘‘मूर्ति-पूजकों का एक और वर्ग है, जिसे वे ब्राह्मण कहते हैं और उनमें जो पुरोहित होते हैं, वे बड़े आकार वाले अपने पूजा-स्थलों तथा प्रार्थना-स्थलों की व्यवस्था करते हैं तथा उन पर उनका अधिकार होता है, जिससे अत्यधिक आमदनी होती है और उनमें से अनेक भिक्षा पर जीते हैं। इनके घरों में लकड़ी की और कुछ पत्थर तथा कांसे की बनी हुई अनेक मूर्तियां होती हैं, और इन घरों या पूजा-घरों में वे इन मूर्तियों के सम्मान में बड़े-बड़े आयोजन करते हैं, मोमबत्तियां तथा तेल के दीपक जलाते हैं और हमारी तरह घंटियां भी बजाते हैं। इन ब्राह्मणों तथा मूर्ति-पूजकों के धर्म में पवित्र त्रिमूर्ति से बहुत समानताएं है और वे त्रिमूर्ति के संबंधों को अत्यधिक सम्मान देते हैं, हमेशा उनकी प्रार्थना करते हैं। जिनके सामने वे अपनी गलतियों को स्वीकार करते हैं और उसे अपना सच्चा ईश्वर, सृजक तथा सभी पदार्थों का निर्माता मानते हैं। त्रिमूर्ति तीन व्यक्ति और एक ईश्वर है और वे कहते है कि अनेक अन्य ईश्वर भी हैं, जो उसके अधीन कार्य करते हैं और वे उनमें भी विश्वास रखते हैं। ये ब्राह्मण तथा मूर्तिपूजक जहां कहीं हमारे गिरजाघरों को देखते हैं, वे उनमें प्रवेश करते हैं और हमारी प्रतिमाओं की पूजा-अर्चना करते हैं,