1. हिंदुत्व के प्रतीक - Page 178

हिंदुत्व के प्रतीक

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नहीं करते। वे राजाओं का एक स्थान से दूसरे स्थान को प्रवास के समय सभी प्रकार का सामान ले जाने का काम करते हैं, लेकिन वे इस क्षेत्र में बहुत कम हैं। वे अलग जाति के होते हैं। इनके शादी-विवाह के कोई नियम नहीं होते हैं। इनमें से ज्यादातर समुद्र से जीवन यापन करते हैं_ वे नाविक होते हैं, और उनमें से कुछ मछुआरे होते हैं_ ये कोई मूर्ति-पूजा नहीं करते। वे नायरों के दास भी होते है।’’

‘‘इससे भी निम्न जाति होती है जिसे मांकर कहा जाता है। मछली पकड़ने के अलावा इन लोगों (मछुआरों) का कोई और कार्य नहीं होता। इनमें से कुछ बीढ़ों के जहाज चलाते हैं और कुछ मूर्ति-पूजकों के जहाज चलाते हैं। ये बहुत ही कुशल नाविक होते हैं। यह जाति बहुत ही अक्खड़ होती है। वे बेशर्म चोर होते हैं, से शादी-विवाह करते हैं और इनके बेटे इनके उत्तराधिकारी होते हैं। इनकी औरतें चरित्रहीन होती हैं और किसी के साथ भी सो सकती हैं तथा इसे वे पाप नहीं समझतीं। इनकी अपनी मूर्ति-पूजा होती है।’’

‘‘मलाबार क्षेत्र में मूर्ति-पूजकों की एक दूसरी जाति भी होती है जो और भी निम्न स्तर की होती है। इसे बेतुनस कहते हैं। इनका व्यवसाय नमक बनाना तथा चावल उगाना है। इनका और कोई जीविका का साधन नहीं होता।

इनके घर सड़कों से दूर मैदानों में होते हैं, जहां भले लोग जाते नहीं हैं। इनकी अपनी मूर्ति-पूजा होती है। ये राजाओं तथा नायरों के दास होते हैं और अपना जीवन गरीबी में बिताते हैं। नायर उन्हेंं अपने से बहुत कदम पीछे चलने देते हैं और उनसे बात भी दूरी से करते हैं। ये किसी दूसरी जाति के साथ संबंध स्थापित नहीं कर सकते।’’

‘‘मूर्ति-पूजकों की दूसरी जाति भी है जो इनसे निम्न तथा उजड्ड होती है, जिसे पाणिन कहते हैं। ये लोग बहुत बड़े जादूगर होते हैं तथा इसके अलावा उनका कोई और जीविका का साधन नहीं होता।’’

‘‘इनसे भी निम्न स्तर की तथा अक्खड़ एक और जाति है, जिसे रिवोलिन कहा जाता है। ये लोग बहुत ही गरीब होते हैं और कस्बों में जलाने की लकड़ी तथा घास बेचते हैं। ये किसी को छू नहीं सकते और न कोई मृत्यु-दंड के भय से इन्हें छू सकता है। वे वस्त्रहीन होते हैं और केवल अपने गुप्तागों को फटे पुराने चीथड़ों से ढकते हैं। इनके शरीर के अधिकांश हिस्से खास पेड़ों की पत्तियों से ढके रहते हैं। इनकी महिलाएं अपने कानों में पीतल की