164 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
बालियां पहनती हैं और अपनी गर्दन, बांह या पैरों में पीतल के बने आभूषण
पहनती हैं। ये हार भी पहनती हैं।’’
‘‘इन जातियों से निम्न मूर्ति-पूजकों की एक और जाति भी है जिसे पोलियाज
कहते हैं। यह अन्य सभी जातियों मेंं अभिशप्त और समाज से बहिष्कृत होती
हैं। ये लोग मैदानों तथा खुले डेरों में गुप्त स्थानों में रहते हैं, जहां अच्छे लोग
कभी नहीं जाते और यदि संयोगवश चले जाए तो अलग बात है। ये लोग
झोपडि़यों में बड़े निम्न तरीके से रहते हैं। वे भैसों तथा बैलों की मदद से
चावल उगाते हैं तथा भैंसे और बैल रखते हैं। ये नायरों से कभी नहीं बोलते
हैं और कभी-कभी उनसे बोलते भी हैं तो काफी दूर से चिल्लाकर बोलते
हैं ताकि वे सुन सकें। ये लोग चीखते-चिल्लाते हुए सड़क पर चलते हैं
और जो कोई भी इनकी आवाज सुनता है, वह पेड़ के किनारे खड़ा रहकर
इन्हेंं रास्ता दे देता है। यदि कोई पुरुष या स्त्री इन्हें छू लेती है तो उसके
सगे-संबंधी उसे वही मार देते हैं तथा वे बदले की भावना से पोलियास की
हत्या कर देते हैं, यदि कोई दंड भुगतने का भय न हो।’’
‘‘इससे भी निम्न और हीन एक और भी जाति है, जिसे पारेन कहते हैं। ये
लोग अन्य सभी जातियों से दूर निर्जन स्थानों पर रहते हैं। ये किसी व्यक्ति
के साथ संबंध नहीं रखते और न ही अन्य कोई व्यक्ति इनके साथ संबंध
रखता है। ये लोग भूत-पिशाचों से भी बुरे और तिरस्कृत समझे जाते हैं।
इन्हें देखना भी अपवित्र और जाति बहिष्कृत माना जाता है। ये जिमीकंद
तथा जंगली पौधों की जड़ें खाते हैं। ये लोग अपनी शरीर के मध्य भाग को
पत्तियों से ढकते हैं जंगली जानवरों का मांस भी खाते हैं।’’
‘‘इसके साथ ही मूर्ति-पूजक जातियों के बीच विद्यमान अंतर का वर्णन
समाप्त होता है। इन जातियों की संख्या कुल मिलाकर 18 है। इनमें से प्रत्येक
एक-दूसरे से भिन्न हैं। ये लोग न तो एक-दूसरे को छूते हैं, और न ही एक
दूसरे के साथ शादी-विवाह करते हैं। मलाबार की इन मूल जातियों के बारे में
आपको बता चुका हूं। इनके अलावा इस क्षेत्र के अन्य विदेशी व्यापारी तथा
व्यवसायी भी हैं जिनके अपने घर तथा जायदाद है और जो मूल निवासियों
की तरह रहते है, लेकिन उनके रीति-रिवाज अपने ही हैं।’’
यह बात समझ में आती है कि ये विदेशी जाति के समग्र तथा विस्तृत चित्रण प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं थे, क्योंकि प्रत्येक विदेशी के लिए हिंदुओं को निजी जीवन पर्दे में होता है ओर उनके लिए यह संभव नहीं है कि वे इसे पैनी निगाह से देख सकें। भारत की सामाजिक रचना, उसकी प्रेरक शक्ति, अलग-अलग स्थानों पर स्थान