1. हिंदुत्व के प्रतीक - Page 180

हिंदुत्व के प्रतीक

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परिवर्तन एवं निजी तथा अनूठे रिवाजों से संचालित होती है, न कि कानूनी तंत्र द्वारा, जिसे किसी कानूनी ग्रंथों से लिया जा सके। लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं है कि इन विदेशियों को हिंदू समाज की जातियां अत्यंत विचित्र और अत्यधिक विलक्षण लगीं। अन्यथा उन्होंने इसे लिखित रूप में दर्ज नहीं किया होता और उन्होंने वह सब-कुछ नहीं लिखा होता, जो उन्होंने भारत में आने के बाद देखा।

इस प्रकार हिंदू समाज-संगठन में जाति कुछ विशेष स्थान रखती हैं और हिंदुओं को अन्य कौमों से अलग करती हैं। जाति एक निरंतर बढ़ने वाली संस्था रही है। यह कभी भी एक समान नहीं रही है। जब मैगस्थनीज ने अपना लेखा-जोखा दिया था, उस समय जाति का स्वरूप तथा आकृति अलबरूनी के विवरण में दी गई जाति के स्वरूप तथा आकृति से भिन्न थी। वह जो पुर्तगालियों के समय में थी, अलबरूनी के समय से भिन्न थी। लेकिन जाति को समझने के लिए उसकी प्रवृत्ति का अत्यधिक विशुद्ध अध्ययन आवश्यक है, जिसे ये विदेशी समझने में असमर्थ थे।

जाति के विषय पर चर्चा करने से पहले पाठक को कुछ मूल संकल्पनाओं से अवगत कराना आवश्यक है, जो हिंदू समाज-संगठन की आधार हैं। हिंदुओं में प्रचलित सामाजिक प्रणाली का सूत्रपात चार वर्णों के उद्भव के साथ शुरू होता है और विश्वास किया जाता है कि इनमें हिंदू समाज बंटा हुआ है। इन चारों वर्णों को चार नाम दिए गए (1) ब्राह्मण, पुरोहित तथा शिक्षित वर्ग (2) क्षत्रिय, सैनिक वर्ग (3) वैश्य, व्यापारी वर्ग, तथा (4) शूद्र, सेवक वर्ग। कुछ समय तक ये वर्ण केवल वर्ण ही रहे। कुछ समय के बाद जो केवल वर्ण ही थे, वे जातियां बन गईं और वे चार जातियां चार हजार बन गइंर्। इस प्रकार आधुनिक जाति-व्यवस्था प्राचीन वर्ग व्यवस्था का विकास मात्र है।

निस्संदेह यह जाति-व्यवस्था वर्ण-व्यवस्था का ही विकास है। लेकिन वर्ण-व्यवस्था के अध्ययन द्वारा कोई भी जाति व्यवस्था के विचार को नहीं समझ सकता है। जाति का वर्ण से पृथक अध्ययन किया जाना चाहिए।

II

कहा जाता है कि पुराने अनीश्वरवादी ने अपने दर्शन को निम्नांकित शब्दों में व्यक्त किया हैः केवल एक बात जो मैं जानता हूं, वह यह है कि मैं कुछ नहीं जानता_ और मुझे विश्वास नहीं कि मैं उसे जानता हूं।

सर डेंजल एबट्सन ने पंजाब में जातिप्रथा के बारे में लिखते हुए कहा था कि इस अनीश्वरवादी ने जो कुछ उसके दर्शन के बारे में कहा है, वह जातिप्रथा के बारे में उसकी भावनाओं को सही रूप में दर्शाता है। निस्संदेह यह सत्य है कि स्थानीय