1. हिंदुत्व के प्रतीक - Page 181

166 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

परिस्थितियों के कारण जातिगत मामलों में कुछ भिन्नता पाई जाती है और इन जातियों के बारे में कोई विवरण देना बहुत ही कठिन होता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जो बात एक स्थान पर लागू होती है, वही दूसरे स्थान पर इसके विपरीत है।

ठीक है कि जातिप्रथा की आवश्यक और मूलभूत विशेषताओं को उसकी अनावश्यक तथा फालतू विशेषताओं से अलग करना कठिन नहीं है। परंतु इसके निश्चित करने का तरीका यह है कि यह पूछा जाए कि वे कौन-कौन से मामले हैं, जिनके अंतर्गत एक व्यक्ति जाति से बहिष्कृत कर दिया जाता है। श्री भट्टाचार्य ने जाति से निष्कासन के निम्नांकित कारण बताएं हैंः (1) ईसाईयत या इस्लाम स्वीकार करना? (2) यूरो या अमरीका जाना, (3) विधवा से शादी करना, (4) यज्ञोपवीत को सबके सामने फेंकना, (5) सबके सामने गौ-मांस, सुअर का मांस या मुर्गे का मांस खाना, (6) किसी मुसलमान, ईसाई या निम्न हिंदू जाति द्वारा बनाया गया कच्चा

खाना सबके सामने खाना, (7) किसी निम्न जाति के शूद्र के घर पुरोहितीय कर्म करना, (8) किसी महिला द्वारा अनैतिक कार्यों के लिए घर से बाहर जाना, तथा (9) किसी विधवा का गर्भवती होना। यह विस्तृत सूची नहीं है और इसमें वे तीन मुख्य अति-महत्वूपर्ण कारण छूट जाते हैं, जिनके कारण जाति से बहिष्कार किया जाता हैं। वे हैं (10) जाति से बाहर अंतर्जातीय विवाह, (11) अन्य जाति के लोगों के साथ बैठकर खाना खाना, तथा (12) व्यवसाय बदलना। श्री भट्टाचार्य के कथन का दूसरा दोष यह है कि इससे आवश्यक तथा अनावश्यक तत्वों के बीच कोई अंतर प्रतीत नहीं होता।

निस्संदेह जब कोई व्यक्ति अपनी जाति से निष्कासित किया जाता है, तो यह दंड-समान होता है। उसके मित्र, रिश्तेदार तथा संगी-साथी उसका आथित्य स्वीकार करने से मना कर देते हैं। वे उसे अपने घरों में आमोद-प्रमोद के लिए आमंत्रित नहीं करते। वह अपने बच्चों के रिश्ते नहीं कर सकता। यहां तक कि उसकी विवाहित पुत्रियां भी उसके घर नहीं आ सकतीं, क्योंकि उन्हें अपनी जाति से बहिष्कार का भय रहता है। उसका पुरोहित, उसका नाई तथा धोबी उसका कार्य करने से मना कर देता है। उसके अपने जाति-बिरादरी के लोग उसके साथ यहां तक संबंध विच्छेद कर लेते हैं कि वे उसके घर में हुई किसी सदस्य की मृत्य पर उसके दाह-संस्कार में भी जाने को मना कर देते हैं। कुछ मामलों में जाति से निष्कासित किए गए व्यक्ति को मंदिरों तथा श्मशानघाट पर भी जाने से रोका जाता है।

जाति से निसकासन के ये कारण अप्रत्यक्ष रूप से जाति के विधान को दर्शाते हैं। लेकिन ये सभी नियम और विधान मौलिक नहीं हैं। इनमें से कुछ ऐसे हैं, जो अनावश्यक हैं। उनके बिना जातिप्रथा बनी रह सकती है। आवश्यक तथा अनावश्यक के बीच दूसरे प्रश्न को पूछकर भेद किया जा सकता है। क्या कोई हिंदू जो अपनी