हिंदुत्व के प्रतीक
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जाति से बहिष्कृत कर दिया गया है, पुनः अपनी जाति में शामिल किया जा सकता है? हिन्दुओं में प्रायश्चित करने की प्रथा है। समाज में निष्कासित व्यक्ति को प्रायश्चित करना पड़ता है। प्रायश्चित करते समय कुछ बातें ध्यान में रखनी होती हैं। पहले तो यह कि जाति के अपराधों में मामलों के कोई प्रायश्चित नहीं होता। दूसरी बात यह है कि ये प्रायश्चित अपराध के अनुसार बदलते रहते हैं। कुछ मामलों में इन प्रायश्चितों में बहुत ही अल्प दंड शामिल होता है। अन्य मामलों में दंड बहुत ही कठोर होता है।
प्रायश्चित के होने और न होने का विशेष महत्व है, इसे स्पष्ट रूप से समझ लिया जाना चाहिए। प्रायश्चित के न होने का मतलब यह नहीं है कि कोई व्यक्ति अपराध करे और उसे माफ कर दिया जाए। इसके विपरीत इसका तात्पर्य यह है कि अपराध की प्रकृति ऐसी है जिसकी गहनता को मापा नहीं जा सकता और यदि अपराधी को निष्कासित कर दिया गया तो उसे पुनः जाति में शामिल नहीं किया जा सकता। उसका उसी जाति में पुनः प्रवेश संभव नहीं है, जिस जाति से उसे निष्कासित किया गया है। प्रायश्चित के होने का अर्थ यह है कि अपराध शमन हो सकता है। अपराधी निर्धारित प्रायश्चित कर सकता है और उस जाति में पुनः प्रवेश पा सकती है, जिससे उसे निष्कासित किया गया है।
दो अपराध ऐसे हैं, जिनके लिए कोई प्रायश्चित नहीं होता। ये हैं (1) हिंदू धर्म से अन्य धर्म में धर्मान्तरण तथा (2) अन्य जाति या अन्य धर्म के व्यक्ति के साथ शादी-विवाह। यह स्पष्ट है कि यदि इन अपराधों के कारण किसी व्यक्ति को अपनी जाति से निकाला गया है तो यह हमेशा के लिए बहिष्कृत हो गया।
अन्य अपराधों के लिए निर्धारित प्रायश्चित कठोर हैं। वे अपराध दो हैं - (1) किसी अन्य जाति या गैर हिंदू व्यक्ति के साथ खान-पान करना, तथा (2) वह व्यवसाय करना, जो उस जाति का नहीं है। अन्य अपराधों के मामलों में दंड बहुत ही हल्का-फुल्का होता है, लगभग न के बराबर।
जाति के मौलिक तत्व कौन से हैं तथा जाति में क्या शामिल होता है, इस बात का पता लगाने के लिए सबसे विश्वसनीय सूत्र प्रायश्चित से संबंधित नियमों द्वारा उपलब्ध कारण बताए गए हैं। वे, जिनके उल्लंघन पर प्रायश्चित की व्यवस्था ही नहीं है, वे जाति प्रथा की आत्मा हैं तथा वे जिनके उल्लंघन पर प्रायश्चित की व्यवस्था है और जो कठोरतम होते हैं, वह जाति प्रथा का शरीर है। अतः यह बिना किसी हिचक से कहा जा सकता है कि जाति के चार मूल नियम हैं। जाति को सामाजिक समूह के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जिसमें - (क) हिंदू धर्म में विश्वास तथा कुछ विनियमों में बंधा होना, (ख) शादी विवाह, (ग) खान-पान, तथा (घ) व्यवसाय। जिसका कि एक सामान्य नाम है, जिसके द्वारा इसे पहचाना जा सकता है।