168 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
शादी-विवाह के मामले में निर्धारित व्यवस्था जाति का समान होना है। विभिन्न जातियों के बीच अंतर्जातीय विवाह नहीं हो सकते। यह सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक योजना है, जिस पर जाति के संपूर्ण ढांचा खड़ा हुआ है।
खान-पान के मामलों में नियम यह है कि कोई भी व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति के साथ खाना नहीं खा सकता, न उससे खाना ले सकता है, जो उसकी जाति से संबधित नहीं है। इसका मतलब यह है कि केवल वहीं लोग जो एक-दूसरे के साथ शादी विवाह नहीं कर सकते, वे साथ-साथ खाना भी नहीं खा सकते। दूसरे शब्दों में, जाति सजातीय इकाई है, साथ ही सामुदायिक इकाई भी है।
व्यवसाय के बारे में व्यवस्था यह है कि सभी व्यक्ति को वही व्यवसाय अपनाना चाहिए, जो उसकी जाति का परंपरागत व्यवसाय है, और यदि उस जाति का कोई व्यवसाय नहीं है, तो उस व्यक्ति को अपने पिता का व्यवसाय करना चाहिए।
जहां तक किसी व्यक्ति की हैसियत का सवाल है, वह निर्धारित तथा पैतृक होती है। वह निर्धारित इसलिए होती है, क्योंकि किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा उसकी उस जाति द्वारा निर्धारित की जाती है, जिस जाति का वह सदस्य होता है। यह पैतृक इसलिए है, क्योंकि एक हिंदू पर उस जाति का ठप्पा लगा होता है जिस जाति के उसके माता-पिता होते हैं। एक हिंदू की वंशानुगत हैसियत नहीं बदल सकती, क्योंकि वह अपनी जाति को नहीं बदल सकता। हिंदू जिस जाति में पैदा होता है उसी जाति के सदस्य के रूप में ही मर जाता है। एक हिंदू अपनी जाति के खो देने पर अपनी प्रतिष्ठा भी खो देता है। लेकिन वह कोई नई या बेहतर या पृथक प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सकता।
किसी जाति के सामने नाम का क्या महत्व है? इसका महत्व स्पष्ट हो जाएगा यदि हम दो प्रश्न पूछें, जो बहुत ही प्रासंगिक है और जाति की संस्था की पूरी तस्वीर के लिए प्रत्येक का सही-सही उत्तर आवश्यक है। सामाजिक समूह या तो संगठित होते हैं या असंगठित। समूह की सदस्यता लेना तथा समूहों से संगठित होना तथा छोड़ना एक निश्चित सामाजिक व्यवस्था के अधीन होते हैं और इसमें उस समूह के अन्य सदस्यों के संबंध में कुछ विशिष्ट कर्तव्य तथा विशेषाधिकार शामिल होते हैं_ तब वह समूह संगठित समूह होता है। कोई समूह ऐच्छिक समूह होता है, जिसमें सदस्य शामिल होते समय इस बात पर पूरा ज्ञान रखते है कि वे क्या कर रहे हैं और उन्हें उन उद्देश्यों का भी पता होता है, जो इस तरह का संबंध स्थापित करने से पूरे होंगे। दूसरी ओर, कुछ ऐसे भी समूह हैं, जिनका कोई भी व्यक्ति बिना किसी इच्छा शक्ति के सदस्य बन जाता है और उन सामाजिक नियमों तथा परंपराओं के अधीन हो जाता है, जिनके ऊपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता।