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हिंदुत्व के प्रतीक

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अब यह कहना आवश्यक नहीं रह जाता कि जाति बहुत ही संगठित सामाजिक समूह है। यह कोई शिथिल व्यवस्था का स्वतंत्र निकाय नहीं है। ठीक इसी प्रकार यह कहना भी आवश्यक नहीं है कि जाति एक अनिवार्य समूह है। हिंदू जाति में पैदा होता है और उस जाति के सदस्य के रूप में ही मरता है। कोई भी हिंदू बिना जाति के नहीं होता और जाति से बच नहीं सकता तथा वह जन्म से लेकर मृत्यु तक जाति से बंधा रहता है। वह उस जाति की व्यवस्थाओं पर परंपराओं का दास हो जाता है, जिनके ऊपर उसका कोई नियंत्रण नहीं होता।

किसी जाति के लिए पृथक नाम का महत्व इस बात में है कि इसमें जाति संगठित तथा अनिवार्य वर्ग के नाम से जानी जाती है। किसी जाति के पृथक तथा विशिष्ट नाम के कारण यह अपेक्षा की जाती है कि उसका एक स्थायी अस्तित्व हो और एक पृथक सत्ता की छाप हो। जाति पर लिखने वाले लेखकों द्वारा पृथक जातियों के लिए अलग-अलग नामों के महत्व को पर्याप्त रूप से नहीं समझा गया है। ऐसा करते समय वे जाति की सर्वाधिक विशिष्टता को नहीं देख पाए हैं। सामाजिक समूह हैं और वे सभी समाजों में हैं। कई देशों के कई सामाजिक समूहों की भारत में अनेक जातियों के साथ तुलना की जा सकती है और उनके समकक्ष माना जा सकता है। कुम्हार, धोबी, बुद्धिजीवी वर्ग जैसे सामाजिक समूह सर्वत्र हैं। लेकिन दूसरे देशों में वे असंगठित तथा ऐच्छिक समूह हैं, जबकि भारत में संगठित एवं अनिवार्य समूह हो गए हैं, अर्थात् वे जाति बन गए हैं, क्योंकि दूसरे देशों में सामाजिक समूहों को कोई नाम नहीं दिया जाता, जबकि भारत में उनको नाम दिया गया है। यही नाम जाति है जो सनातन बन जाती है। यह नाम ही है, जो यह बताता है कि उसके कौन-कौन से सदस्य हैं और अधिकांश मामलों में किसी जाति में पैदा हुआ व्यक्ति उस जाति के नाम को ही अपने नाम के आगे उपनाम के रूप में लगाता है। पुनः यह नाम ही है जो किसी जाति के लिए सरल बना देता है कि वह अपने विधि-विधान को लागू कर सके। इससे दो प्रकार की सरलता होती है। पहली तो यह है कि जिस व्यक्ति के नाम के सामने उपनाम के रूप में उसकी जाति का नाम है अपराध करने पर वह पकड़ा जाता है, क्योंकि इससे यह पता चल जाता है कि वह अन्य जाति का नहीं है और इस प्रकार वह जाति के न्यायाधिकार से नहीं बच पाता। दूसरे अपराध करने वाले व्यक्ति का पता चल जाता है तथा उस जाति का पता चला जाता है, जिस जाति के न्याय-क्षेत्र के अंतर्गत वह आता है, ताकि जाति के निमयों को भंग करने के लिए उसे आसानी से पकड़ा जा सके और दंडित किया जा सके।

जाति का यही मतलब होता है। अब हम जाति प्रणाली पर आते है। इसमें विभिन्न जातियों के बीच आपसी संबंधों का अध्ययन शामिल है। जाति में जमघटों को देखने पर पता चलता है कि जाति-प्रणाली कई विशेषताओं को प्रस्तुत करती है, जो दिन