170 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के उजाले की तरह दमकते हैं। पहले तो इस प्रणाली को बनाने वाली विभिन्न जातियों के बीच कोई परस्पर संबंध नहीं है। प्रत्येक जाति पृथक तथा विशिष्ट है। प्रत्येक जाति अपने आंतरिक क्रियाकलापों को करने तथा जातिगत व्यवस्थाओं को लागू करने के लिए स्वतंत्र तथा प्रभुसत्ता संपन्न है। ये जातियां एक दूसरे से जुड़ी तो हैं_ पर उनमें अंतरंग संबंध नहीं हैं। दूसरी विशेषता उस व्यवस्था से संबंधित है, जिसके अंतर्गत इस प्रणाली में एक जाति का दूसरी जाति के साथ संबंध होता है। क्रम समस्तर न होकर ऊर्ध्वाकार है। जाति और जातिप्रथा ऐसी है। प्रश्न यह है कि क्या यह हिंदू समाज-संगठन को जानने के लिए पर्याप्त हैं? हिंदू समाज की जड़ता ही जाति प्रथा का मूल है, इसी का उल्लेख पर्याप्त है। इन तथ्यों के अलावा और अधिक जानने का कष्ट करने की आवश्यकता नहीं है कि हिंदू जातियों में बंटे हुए है और ये जातियां इस प्रणाली का जाल हैं जिसमें सभी एक धागे से लटके हुए हैं, जो इस प्रणाली में इस तरह से गुथा हुआ है किसी एक जाति को दूसरी जाति से अलग करते समय यह सभी को बंध लेता है मानों यह टेनिस की गेंदों की माला हो। लेकिन जाति के गतिशील स्वरूप को समझने के लिए यह पर्याप्त नहीं होगीं। किसी जाति के क्रियाकलाप को समझने के लिए यह आवश्यक है कि जाति-प्रणाली के अलावा जाति की दूसरी विशेषता-वर्ण व्यवस्था को समझा जाए।
जाति तथा वर्ण का अंतःसंबंध अत्यंत विसादास्पद रहा है। कुछ कहते हैं कि जाति वर्ण के समकक्ष है और उन दोनों में कोई अंतर नहीं है। अन्य का विचार है कि जातियों का अभिप्रायः वर्ण के अभिप्रायः से मूल रूप से पृथक है। यह जाति प्रथा का वह पहलू है, जिसके बारे में और अधिक बाद में बताया जाएगा। अभी तो उस जाति-प्रणाली पर बल देना आवश्यक है, जिसके बारे में अभी तक कुछ नहीं कहा गया। वह यह है कि यद्यपि जाति पृथक है और वर्ण की संकल्पना के विरुद्ध है, तथापि जाति-प्रणाली जाति से पृथक एक ऐसी वर्ण व्यवस्था को मान्यता देती है, जो कुछ-कुछ उल्लिखित वर्गीकृत प्रतिष्ठा से भिन्न है। जैसे कि हिंदू कई जातियों में बंटे हुए हैं, जातियां भी उप-जातियों में बंटी हुई हैं। हिंदू, जाति के प्रति सावधान होता है। वह वर्ण के प्रति भी कठोर होता है। वह जाति के प्रति कठोर है या वर्ण के प्रति कठोर है, यह उस जाति पर निर्भर करता है, जिसके साथ उसका संघर्ष होता है। यदि जिस जाति के साथ उसका विवाद होता है और वह ऐसी जाति के जिसके अंतर्गत वह आता है, जिसका कि वह सदस्य है, तो वह जाति के प्रति सचेत होता है। यदि वह जाति उस वर्ण के बाहर की है जिसका कि वह सदस्य है, ऐसे समय वह वर्ण के प्रति जागरूक हो जाती है। यदि कोई इस संबंध में साक्ष्य चाहता है तो उसे मद्रास और बंबई प्रेसीडेंसी में गैर-बाह्मण आंदोलन का अध्ययन करना होगा। इस प्रकार के अध्ययन से कोई संदेह नहीं रहेगा कि एक हिंदू के लिए जाति की