1. हिंदुत्व के प्रतीक - Page 186

हिंदुत्व के प्रतीक 171

परिधि भी उतनी ही वास्तविक है, जितनी कि वर्ण की परिधि, और जाति-भाव उतनी ही वास्तविक है जितना कि वर्ण-भेद।

कहा जाता है कि जाति वर्ण-व्यवस्था का विस्तार है। बाद में बताऊंगा कि वह बकवास है। जाति वर्ण का विकृत स्वरूप है। यह विपरीत दिशा में प्रसार है। जात-पात ने वर्ण-व्यवस्था को पूरी तरह विकृत कर दिया है, लेकिन इसने जाति प्रथा वर्ण-व्यवस्था से अपनाई है। वास्तव में वर्ग-जाति प्रणाली वर्ण-प्रणाली के वर्ण-वैदीर्ण्य का निकटता से अनुसरण करती है।

इस दृष्टिकोण से जाति प्रणाली पर दृष्टि डालते हुए वर्ग-वैदीर्ण्य की हम कई रेखाओं को देखते है जो जातियों के एक पिरामिड से होकर गुजरती है और इस पिरामिड को जाति के ब्लॉकों में विभक्त करती हैं। वैदीर्ण्य की पहली रेखा विभाजन की उस रेखा का अनुसरण करती है जो प्राचीन चातुर्वर्ण्य प्रणाली में पाई जाती है। चातुर्वर्ण्य की प्राचीन प्रणाली में पहले तीन वर्णों ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्यों और शूद्र नामक चौथे वर्ण के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है। पहले तीन वर्ण धर्म, संस्कार-संपन्न वर्ग थे। शूद्र को अब अधर्म संस्कार-सम्पन्न माना जाता है। यह अंतर इस तथ्य पर आधारित है कि पहले वाले यज्ञोपवीत धारण करने तथा वेदों का अध्ययन करने के हकदार थे। शूद्र न तो यज्ञोपवीत धारण कर सकते थे, न ही वेदों का अध्ययन कर सकते थे। यही कारण है कि उसे अब अधर्म संस्कार संपन्न वर्ग माना जाता है। वैदीर्ण्य की यह रेखा अब भी विद्यमान है और वह आज के वर्ण विभाजन का आधार है जो उन जातियों को जो शूद्रों के बहुत बड़े वर्ग से पैदा हुई है और उनको जो ब्राह्मण तथा क्षत्रियों तथा वैश्यों के तीन वर्गों से पैदा हुए हैं, अलग करती है। वर्ग-वैदीर्ण्य की यह रेखा ही है जो उच्च जाति तथा निम्न जाति जैसे शब्दों द्वारा व्यक्त होती है और जो उच्च वर्ग जाति तथा निम्न वर्ग जाति का संक्षेपण है।

वर्ग-वैदीर्ण्य की इस रेखा के बाद इस पिरामिड से होकर वैदीर्ण्य की एक दूसरी रेखा भी गुजरती है। यह रेखा निम्न वर्ग की जातियों से ठीक नीच होती है। यह चारों वर्गों से उत्पन्न जातियों के नीचे तथा निम्न जाति, जिन्हें मैं मात्र ‘शेष’ कहूंगा उसके ऊपर से गुजरती है। वर्ग-वैदीर्ण्य की यह रेखा पुनः वास्तविक है और सुपरिभाषित विशिष्टतायुक्त है जो कि चातुर्वर्ण्य प्रणाली का मौलिक सिद्धांत है। जैसा कि बताया गया है कि चातुर्वर्ण्य प्रणाली चारों वर्गों के बीच अंतर स्थापित करती थी, जिसमें तीन वर्णों को चौथे वर्ण के ऊपर माना जाता था। लेकिन इससे चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत आने वाले तथा चातुर्वर्ण्य के बाहर आने वाली जातियों के बीच भी इतना ही स्पष्ट अंतर किया है, जो चातुर्वर्ण्य के अंतर्गत होते थे, उच्च या निम्न, ब्राह्मण या शूद्र, उन्हें सर्वण कहा जाता था, अर्थात् वे लोग जिन पर वर्ण की छाप होती थी। जो