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हिंदुत्व का दर्शन

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धर्म अपने सभी अभिव्यक्त रूपों में एक ऐतिहासिक या मनोवैज्ञानिक तत्व

हैं।’ इस बात पर ध्यान देना होगा कि ये घटनाएं धर्म के दर्शन का आधार

तो बनती हैं, परंतु वे स्वयं दर्शन अथवा टीले के शब्दों में, धर्म का ‘विज्ञान’

नहीं बनती। टीले कहते हैं, ‘मैंने सभी विद्यमान धर्मों का बारीकी से वर्णन

किया है। उन्होंने उनके सिद्धांतों, परंपराओं और दंतकथाओं के बारे में भी

प्रकाश डाला है। जो तत्व संस्कारों की शिक्षा देते हैं, उनका, और धर्मों से

साथ जुड़े हुए लोगों के संगठनों का भी वर्णन किया है। टीले महोदय ने

इस क्षेत्र में बहुत कार्य किया है। उन्होंने विभिन्न धर्मों का उनकी उत्पत्ति

से लेकर विकास तक और बाद में पतन तक का पता लगाया है। उन्होंने

केवल उन्हीं बातों को ही संगृहीत किया है, जिनके आधार पर धर्म का

विज्ञान क्रियाशील रहता है। उनका कहना है कि ऐतिहासिक जानकारी चाहे

कितनी भी पूर्ण हो, पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इतिहास दर्शन नहीं है। धर्म का

दर्शन निश्चित करने के लिए धर्म के विभिन्न रूपों में जो समान तत्व है,

जिसकी जड़ें हम मानव-स्वभाव में देख सकते हैं, उसे जानना आवश्यक

है। ऐसे तत्व का विकास उसके संपूर्ण रूपों में और उसके विकास के नीचे

के ऊपर तक ही स्पष्ट अवस्थाओं द्वारा जाना जा सकता है। उसके साथ ही

मानव-सभ्यता के मुख्य तत्वों से उनके जो गहरे संबंध हैं, उन्हें भी जाना

जा सकता है।’’

यदि इसे ही धर्म का दर्शन समझा जाए, तब जिसे तुलनात्मक धर्म कहा जाता है, उसके अध्ययन का ही यह एक अलग नाम है, जिसका एक और उद्देश्य यह है कि धर्म के विभिन्न रूपों में जो समान तत्व है, उसे जाना जाए। ऐसा मुझे लगता है। ऐसे अध्ययन का क्षेत्र और महत्व चाहे कुछ भी हो, किंतु ‘धर्म का दर्शन’ शीर्षक का प्रयोग प्रो. प्रिंगले-पेटीसन ने जिस अर्थ में किया है, मैं उसके बिल्कुल विपरीत अर्थ में रहा हूं। मैं ‘दर्शन’ शब्द का उसके मूल अर्थ में ही प्रयोग कर रहा हूं, जिसके दो अर्थ हैं। इसका अर्थ है उपदेश, जैसा कि लोग सुकरात और प्लेटो के दर्शन के बारे में कहते हैं। दूसरे अर्थ में, इसका तात्पर्य है किसी भी विषय तथा घटना पर निर्णय देते समय सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का प्रयोग करना। इस आधार पर अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए मेरे धर्म का दर्शन, केवल वर्णनात्मक शास्त्र नहीं है। मैं उसे वर्णनात्मक और नियमबद्ध शास्त्र दोनों मानता हूं। जहां तक उसका धर्म के उपदेश के साथ संबंध है, धर्म का दर्शन केवल वर्णनात्मक शास्त्र बनता है। परंतु जब उसका संबंध उन उपदेशों पर निर्णय लेने के लिए सूक्ष्म विवेक-बुद्धि का उपयोग करने से होता