1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 21

6 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

है, तब धर्म का दर्शन एक नियमबद्ध शास्त्र बनता है। इससे यह स्पष्ट हो जाएगा कि हिंदु धर्म के दर्शन के अध्ययन से मेरा संबंध किन बातों से है। स्पष्टतः मैं हिंदू धर्म का विश्लेषण जीवन-शैली के रूप में उसमें छिपे महत्व को निर्धारित करने के रूप में करूंगा।

यहां एक पहलू तो स्पष्ट हो जाता है। लेकिन इसका एक पहलू और है, जिसका स्पष्ट होना शेष है। इसका संबंध इसी के नजदीकी अंगों की जांच करने से है, और जिन शब्दों का प्रयोग मैं करूंगा, यह उनकी परिभाषाओं से संबद्ध है।

मेरे विचार में धर्म के दर्शन के अध्ययन में तीन आयामों का होना आवश्यक है। मैं उन्हें आयाम कहता हूं, क्योंकि वे उन अज्ञात अंशों के समान हैं, जिनका उत्पादन के अंगों में समावेश होता है। यदि हम धर्म के दर्शन के परीक्षण का कोई नतीजा निकालना चाहते हैं, तब हमें उन आयामों की जांच करके उनकी व्याख्या निश्चित करनी होगी।

इन तीन आयामों में प्रथम है-धर्म। धर्म की परिभाषा से हम क्या समझते हैं, इसे निश्चित करना आवश्यक है, जिससे हम परस्पर-विरोधी तर्क-वितर्कों को टाल सकें, उनसे बच सकें। यह बात धर्म के संबंध में विशेष रूप से आवश्यक है, क्योंकि उसकी निश्चित व्याख्या के बारे में सहमति नहीं है। वैसे इस प्रश्न पर विस्तार से चर्चा करने की आवश्यकता भी नहीं। इसलिए इस शब्द का प्रयोग मैं जिस अर्थ में यहां कर रहा हूं, उसे स्पष्ट करने से ही मेरा समाधान हो जाएगा।

धर्म शब्द का प्रयोग मैं ब्रह्मविज्ञान के रूप में करता हूं। शायद व्याख्या की दृष्टि से इतना ही कहना पर्याप्त नहीं होगा, क्योंकि ब्रह्मविज्ञान भी अलग-अलग तरह का है और मुझे वह सब स्पष्ट करना चाहिए। प्राचीनकाल से ही ऐतिहासिक दृष्टि से जिनकी चर्चा की जाती रही है, ऐसे ब्रह्मविज्ञान दो तरह के हैंः पौराणिक ब्रह्मविज्ञान और लौकिक ब्रह्मविज्ञान। लेकिन ग्रीक लोगों ने इन दोनों की व्याख्या इस प्रकार से की है। पौराणिक बह्मविज्ञान से उनका अर्थ है, देवी-देवता और उनके कार्य-कलाप की कहानियां, जिन्हें प्रचलित काल्पनिक साहित्य में दर्शाया गया है। दूसरे, यानी लौकिक ब्रह्मविज्ञान में विभिन्न त्योहार तथा समारोह और उनसे संबंधित रीति-रिवाजों की जानकारी का समावेश होता है। मैं इन दोनों अर्थों के अनुरूप ब्रह्मविज्ञान शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूं। मेरे अनुसार ब्रह्मविज्ञान का अर्थ है, नेसर्गिक ब्रह्मविज्ञान ख्1, जो ईश्वर और ईश्वरीय उपदेशों का सिद्धांत है। वह नैसर्गिक प्रक्रिया का ही एक अविभाजित अंग है। पारंपरिक और रूढ़ अर्थ में नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान तीन सिद्धांतों

  1. नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान के एक विशिष्ट अध्ययन विभाग के रूप में उत्पत्ति प्लेटो द्वारा हुई। देखेंः ‘लाज’