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हिंदुत्व का दर्शन

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का प्रतिपादन करता है- (1) ईश्वर का अस्तित्व है और वह विश्व का निर्माता है_ (2) प्राकृतिक रूप में होने वाली सभी घटनाओं पर ईश्वर का नियंत्रण है, और (3) ईश्वर अपने सार्वभौमिक नैतिक नियमों द्वारा मानवजाति पर शासन करता है।

मैं इस बात से अवगत हूं कि साक्षात्कारी दैवी सत्य का स्वेच्छा से प्रकटन नाम का ब्रह्मविज्ञान अलग है, और इसे नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान से भिन्न किया जा सकता है, लेकिन यह भेद हमारे लिए महत्व नहीं रखता, क्योंकि जैसा बताया गया है ख्1, , साक्षात्कार की फलश्रुति बिना किसी परिवर्तन के नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान में होती है और मानवीय प्रयासों से जो ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसे केवल उसके साथ जोड़ा जाता है अथवा नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान में ऐसा परिवर्तन होता है कि उसका संपूर्ण सत्य स्वरूप जब उसके सही साक्षात्कार को ध्यान में रखते हुए देखा जाता है, तब वह अधिक स्पष्ट और अधिक समृद्ध बन जाता है। लेकिन ऐसा भी एक मत है कि मूल नैसर्गिक ब्रह्मविज्ञान और मूल साक्षात्कारी ब्रह्मविज्ञान, दोनों में परस्पर विसंगति है। यहां उसकी चर्चा टालना उचित ही होगा, क्योंकि ऐसी चर्चा संभव नहीं है।

ब्रह्मविज्ञान के तीन सिद्धांत हैं- (1) ईश्वर का अस्तित्व, (2) ईश्वर का विश्व पर दैवी शासन, और (3) ईश्वर का मनुष्य जाति पर नैतिक शासन इन सभी को ध्यान में रखते हुए मेरी मान्यता है कि धर्म का अर्थ दैवी शासन की आदर्श योजना का प्रतिपादन करना है, जिसका उद्देश्य एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाना है, जिसमें मनुष्य नैतिक जीवन व्यतीत कर सके। धर्म से मैं यही भाव ग्रहण करता हूं और इस परिचर्चा में मैं ‘धर्म’ शब्द का इसी अर्थ में प्रयोग करूंगा।

दूसरा आयाम है, धर्म जिस आदर्श योजना का समर्थन करता है, उसे जानना। किसी भी समाज के धर्म में स्थापित, स्थायी और प्रभावशाली अंग क्या हैं, उन्हें निश्चित करना और उनके आवश्यक गुणों को अनावश्यक गुणों से अलग करना। यह कभी-कभी बहुत कठिन होता है। संभवतः इस कठिनाई का कारण उस कठिनाई में छिपा हुआ है, जिसके बारे में प्रो. राबर्टसन स्मिथ ख्2, कहते हैंः

‘‘धर्म की परंपरागत प्रथाओं में अनेक शताब्दियों में धीरे-धीरे वृद्धि हुई है

और उसका मनुष्य की वैचारिक प्रकृति तथा उसके बौद्धिक और नैतिक

  1. दि फेथ ऑफ एक मोरेलिस्ट, ए.ई. टाइलर, पृष्ठ 19

  2. दि रिलीजन ऑफ सैमाइटस, (1927)