16 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
समाज नहीं था, क्योंकि मनुष्यों के समान देवताओं की भूमिका और अस्तित्व
था। जिस समुदाय में मनुष्य का जन्म होता था, वह केवल उसके सगे-संबंधियों
तथा अन्य सहयोगी नागरिकों का समुदाय ही नहीं होता था, बल्कि उसे कुछ
दिव्य विभूतियों, जैसे कि परिवार तथा राज्य के देवताओं को भी अंगीकार
करना पड़ता था। प्राचीन मत के अनुसार यह सब-कुछ किसी विशेष समुदाय
का एक अभिन्न भाग होता था, जैसा कि कोई मानव सदस्य किसी सामाजि
समुदाय का एक भाग होता है। प्राचीन काल के देवताओं और उनके उपासकों
का आपसी संबंध मानवी संबंधों की भाषा से व्यक्त किया जाता था, जिसका
काव्यात्मक नहीं, बल्कि शाब्दिक अर्थ होता था। यदि किसी देवता को पिता,
और उसके उपासकों को उसकी संतान कहा जाए, तब उसका शब्दशः अर्थ
यही होता था कि ये उपासक उसकी उत्पत्ति हैं, और उस देवता तथा उसके
उपासकों का एक नैसर्गिक परिवार बन जाता जिसमें उसके एक-दूसरे के प्रति
परस्पर पारिवारिक कर्तव्य हैं। अथवा, यदि किसी देवता को राजा के रूप में
और उसके उपासकों को उसके सेवकों के रूप में संबोधित किया जाए, तब
उसका अर्थ यही होता था कि शासन चलाने के सर्वोच्च अधिकार उस देवता
के हाथों में ही हैं और उसके अनुसार शासन पद्धति में सभी महत्वपूर्ण मामलों
पर उसकी राय जानने, उसके आदेश प्राप्त करने और इसके साथ ही उसके
प्रति राजा के समान आदर-सम्मान व्यक्त करने का प्रबंध होता था।
‘‘इस प्रकार से किसी भी मनुष्य का किन्हीं विशेष देवताओं के साथ जन्म
से ही उसी प्रकार का संबंध होता था, जिस प्रकार का उसका अन्य सहयोगी
मनुष्यों के साथ होता है और उसके इन देवताओं के साथ संबंधों के आधार
पर उसका धर्म निश्चित होता था जो उसके आचरण का एक भाग है। यह
आचरण उस सर्वसाधारण आचार-संहिता का एक भाग माना जाता था, जो
उस समाज के सदस्य के रूप में उस पर लागू होती थी। धर्म का क्षेत्र और
सामान्य जीवन, दोनों के साथ संबंध होता था, क्योंकि सामाजिक रचना
केवल मनुष्य से ही नहीं, बल्कि मनुष्य और देवता, दोनों से मिलकर की
गई थी।’’
‘‘इस प्रकार से प्राचीन समाज में मनुष्य तथा उसके देवता, दोनों को मिलाकर समाज की सामाजिक, राजनीतिक तथा धार्मिक संरचना की जाती थी। धर्म की स्थापना देवता और उसके उपासकों की घनिष्ठता के आधार पर की जाती थी। आधुनिक समाज ने देवताओं को अपनी सामाजिक संरचना से अलग कर दिया है। अब उसमें केवल मनुष्यों का समावेश है।’’