हिंदुत्व का दर्शन
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प्राचीन समाज और आधुनिक समाज में जो दूसरा भेद है, उसका संबंध समाज तथा देवता के बीच रिश्तों से है। प्राचीन संसार में विभिन्न जातियांµ
‘‘अनेक देवताओं के अस्तित्व में विश्वास रखती थीं, क्योंकि वे अपने स्वयं
के तथा अपने शत्रुओं के देवताओं को भी स्वीकार किया करती थीं। परंतु
जिनसे इन्हें किसी लाभ की अपेक्षा नहीं होती थी और जिन पर चढ़ाई गई
भेंट तथा दान लाभदायक नहीं मानती थी। ऐसे अपरिचित देवताओं की वे
पूजा नहीं करती थी। प्रत्येक समुदाय का अपना एक देव, अथवा शायद देव
तथा देवियां हुआ करते थे और उनका अन्य देवताओं के साथ किसी प्रकार
का कोई रिश्ता नहीं होता था।’’
प्राचीन समाज के देवता एक निराला देवता था। ख्1, उस देवता का केवल एक ही जाति के साथ संबंध होता था और उस पर उसी एक जाति का अधिकार होता था। यह बात निम्न प्रकार से स्पष्ट होती हैः
‘‘देवता अपने उपासकों के झगड़ों तथा युद्धों में भाग लेते थे। देवता के शत्रु
और उसके उपासकों के शत्रु एक ही हुआ करते थे। इतना ही नहीं ओल्ड
टेस्टामेंट में ‘जहोवा के शत्रु’ मौलिक रूप से वही हैं, जो इजराइल के शत्रु
थे। युद्ध में प्रत्येक देवता अपने लोगों के लिए ही लड़ता है, और उसकी
सहायता से ही सफलता मिलती है, ऐसा माना जाता है। चेमोश ने मोआव
की, और एशर ने असीरिया की सफलता का कारण बताया और कई बार
इन दैवी प्रतिमाओं को अथवा चिह्नों को लड़ने वाले युद्ध में साथ ले जाते
थे। जब आर्क को इजरालत के डेरे में लाया गया, तब फिलीस्टाईन ने कहा,
‘आर्क के रूप में देवता का हमारे डेरे में आगमन हुआ है और वह निश्चित
ही अपनी सामर्थ्य से हमें सफलता हासिल करा देगा, क्योंकि जब डेविड
उनका बालापेराजिम में पराभव किया, तब लूट के माल में उन देवताओं की
प्रतिमाए शामिल थीं, जो वे युद्ध-भूमि में अपने साथ ले गए थे। मेसीडोन
के फिलिप राजा के साथ ‘कार्थजिनियंस’ लोगों का जो समझौता हुआ था,
उसमें उन लोगों ने इस तरह उल्लेख किया है- ‘अभियान में भाग लेने वाले
देवता’ का निस्संदेह उन पवित्र शिविरों के वासियों से संबंध है, युद्ध-भूमि
में जिनका शिविर मुख्य सेनापति के शिविर के साथ लगाया गया था और
जिसके सामने विजय के बाद कैदियों की बलि दी गई थी। उसी प्रकार से
- दि रिलीजन ऑफ सैमाइट्स