1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 33

18 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

किसी अरब कवि ने कहा था, ‘युगूथ हमारे साथ मोराद के विरुद्ध आया।’

इसका मतलब है कि युगूथ देवता की प्रतिमा युद्ध में साथ लाई गई थी।’’

इस तथ्य से यह सिद्ध होता है कि देवता और समाज में दृढ़ सामंजस्य था।

‘‘अतः देवता और उनके उपासकों के बीच सामंजस्य के इस तत्व के आधार

पर बने राजनीतिक समाज के विशेष गुण धार्म के क्षेत्र में परिलक्षित होते हैं।

इसी प्रकार से, जब किसी भी समुदाय अथवा गांव के देवता का उन लोगों

की आराधना तथा सेवा पर निर्विवाद अधिकार होता है जिनका वह देवता

होता है, तब वह उनके शत्रुओं का शत्रु भी होता है और उन लोगों के लिए

अनजान होता है, जिन्हें वे लोग नहीं जानते। ख्1, ’’

इस तरह देवता का एक समुदाय के साथ और समुदाय का अपने देवता के साथ संबंध स्थापित हो गया। देवता उस समुदाय का देवता और वह समुदाय उस देवता का मनोनीत समुदाय बन गया।

इस दृष्टिकोण के दो परिणाम हुए। प्राचीन समाज ने यह सिद्धांत कभी भी इस धारणा के रूप में स्वीकार नहीं किया कि देवता विश्वव्यापी है और वह सभी का देवता है। प्राचीन समाज में कमी थी यह धारणा नहीं बनी कि इस सबके अलावा समाज में मानवता नाम की कोई वस्तु है।

प्राचीन और आधुनिक समाज में जो तीसरा मतभेद है, उसका संबंध देवता के पितृत्व की संकल्पना के साथ है। प्राचीन समाज में देवता को लोगों का पिता माना जाता था, परंतु इस पितृत्व की संकल्पना का आधार शारीरिक माना गया था।

‘‘मूर्ति-पूजक धर्मों में देवताओं के पितृत्व के रूप में माना जाता था। उदाहरण

के लिए, ग्रीक लोगों की यह कल्पना कि जिस प्रकार से कुम्हार माटी से

प्रतिमाएं बनाता है, उसी प्रकार से देवताओं ने मनुष्यों को मिट्टी से आकार

प्रदान किया है_ यह एक प्रकार से आधुनिक कल्पना है। पुरानी धारणा यह

है कि मनुष्य दोनों की माता है और इस तरह मनुष्य वास्तव में देवताओं के

वंश के अथवा उनके स्वजन बन जाते हैं। यही धारणा पुराने सेमाइट्स लोगों

में बनी थी, ऐसा बाइबिल से स्पष्ट होता है। जैरेमिह लोग इन मूर्तियों का

अपने पूर्वजों के रूप में वर्णन करते हैं जैसे, तुम मेरे पिता हो_ और उस

पत्थर को कहते हैं, तुम मुझे इस संसार में लाए। प्राचीन कविता नुम 21-29

में, मोआब लोगों को चेमोश देवता के पुत्र-पुत्री कहा गया है, और बहुत ही

  1. दि रिलीजन ऑफ सैमाइट्स