1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 35

20 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

थीं और कई बार वे भी उन दुर्गुणों में व्यस्त हुआ करते थे, जिनसे अनेक लोग ग्रस्त थे। उपासकों को अपने देवताओं की इस बात के लिए प्रार्थना करनी पड़ती थी कि कहीं वे भी उन्हें लालच की ओर न ले जाएं।

आधुनिक समाज में दैवी पितृत्व की कल्पना का प्राकृतिक आधार पर नैसर्गिक पितृत्व से पूर्ण रूप से संबंध विच्छेद हो गया। उसके स्थान पर यह कल्पना प्रचलित हो गई कि मनुष्य की देवता के रूप में निर्मिति होती है, वह वास्तव में देवता से उत्पन्न नहीं होता। देवता के पितृत्व की कल्पना में आए इस परिवर्तन को यदि नैतिक दृष्टि से देखा जाए, तो उसके कारण देवता के सृष्टि के संचालनकर्ता रूप में बहुत भारी परिवर्तन आया है। देवता को उसके प्राकृतिक रूप में परिपूर्ण उत्तमता और सद्गुणों के योग्य नहीं माना जाता था और जब देवता ही अपने सदाचार में परिपूर्ण नहीं था, तब उसके अनुसरण से यह सृष्टि भी सदाचार से परिपूर्ण हो, ऐसी अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। देवता के मनुष्य के साथ शारीरिक संबंधों के विच्छिन होने के कारण अब यह कल्पना की हो सकती है कि देवता उत्तमता एवं सद्गुणों से परिपूर्ण हो।

मतभेद का चौथा मुद्दा, जब राष्ट्रीयता में परिवर्तन होता है, तब धर्म को जो भूमिका निभानी पड़ती है, उससे संबंधित है।

प्राचीन संसार में जब तक धर्म-परिवर्तन न किया जाए, राष्ट्रीयता में परिवर्तन नहीं हो सकता था। प्राचीन संसार मेंµ

‘‘किसी व्यक्ति के लिए अपनी राष्ट्रीयता में परिवर्तन किए बगैर धर्म-परिवर्तन

करना असंभव था और संपूर्ण जाति के लिए धर्म परिवर्तन करना तब तक

असंभव था जब तक कि उन्हें किसी जाति में अथवा राष्ट्र में पूर्ण रूप से

समाहित न कर लिया जाए। राजनीतिक संबंधों की तरह धर्म भी पुत्र को

अपने पिता से प्राप्त होता था, क्योंकि मनुष्य अपनी इच्छाओं से नए देवता

का चयन नहीं कर सकता था। अपने रिश्ते-नातों का त्याग करके उसे दूसरे

नागरिक जीवन तथा धार्मिक जीवन के समुदाय में जब तक स्वीकार न किया

जाए, तब तक उसके लिए उसके पिता के देवता ही एकमात्र ऐसे देवता होते

थे, जिन पर वह मैत्री के लिए निर्भर रह सकता था और जो उसकी पूजा

को स्वीकार कर सकते थे।’’

सामाजिक एकरूपता के लिए धर्म-परिवर्तन की कसौटी कि तरह आवश्यक होती थी, यह बात ओल्ड टेस्टामेंट के ‘नाओमी’ और ‘रूथ’ के बीच संवाद से स्पष्ट होती है।