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हिंदुत्व का दर्शन

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नाओमी रूथ से कहता है, ‘तुम्हारी बहन उसके अपने लोगों में और अपने देवताओं में चली गई है।’

और रूथ उत्तर देता है, ‘तुम्हारे लोग मेरे लोग होंगे और तुम्हारा ईश्वर मेरा ईश्वर होगा।’

यह बात सर्वथा स्पष्ट है कि प्राचीन संसार में राष्ट्रीयता में परिवर्तन के लिए संप्रदाय (पंथ) में परिवर्तन अनिवार्य था। सामाजिक एकरूपता का मतलब धार्मिक एकरूपता था।

आधुनिक समाज में सामाजिक एकरूपता के लिए किसी एक धर्म का त्याग करना अथवा दूसरे धर्म को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है। यह बात आधुनिक व्याख्या में, जिसे स्वाभाविकरण कहा जाता है, स्पष्ट होती है, जिसमें एक राज्य का नागरिक अपनी नागरिकता का त्याग करता है और किसी नए राज्य का नागरिक बनता है। स्वाभाविकरण की इस प्रक्रिया में धर्म का कोई स्थान नहीं है। कोई भी व्यक्ति धार्मिक एकरूपता प्राप्त कर सकता है और इसी का दूसरा नाम स्वाभाविकरण है।

आधुनिक समाज के प्राचीन समाज से भिन्नता स्पष्ट करने के लिए केवल इतना कहना ही पर्याप्त नहीं है कि आधुनिक समाज केवल मनुष्यों का बना है। उसके साथ, यह बात भी माननी होगी कि आधुनिक समाज उन मनुष्यों का बना है, जो भिन्न-भिन्न देवताओं की पूजा करते हैं।

मत-भिन्न्ता का पांचवां मुद्दा धर्म के एक भाग के रूप में देवताओं के स्वरूप के ज्ञान से संबंधित है।

‘‘प्राचीन दृष्टिकोण से देवता स्वयं क्या है, यह प्रश्न धार्मिक नहीं किन्तु

काल्पनिक है। धर्म के लिए यह आवश्यक है कि देवता जिन नियमों का

पालन करते हैं, उनके उपासकों को उनकी व्यावहारिक जानकारी हो, और

वे उनसे तदनुसार आचरण करने की अपेक्षा करते हैं। इसे 2 किंग्स के

पाठ 17, श्लोक 26 में धरती के ‘आचार’ अथवा प्रायः ‘पारंपरिक नियम’

(मिस्फात) कहा गया है। यह बात इजराइल के धर्म के लिए भी लागू है।

जब धर्मोपदेशक अपनी सरकार के कानूनों तथा सिद्धांतों के ज्ञान की बात

करते हैं और पूरे धर्म का सार स्पष्ट करते हैं, तब वह ‘जहोवा का ज्ञान

तथा भय’ ही है अर्थात् जहोवा ने क्या निर्देश दिए हैं, वे निर्देश और उनका

आदरयुक्त पालन। धर्मोपदेशकों के ग्रंथों में सभी धार्मिक सिद्धांतों के प्रति

अत्यधिक संदेह व्यक्त किया गया है जो धर्मनिष्ठ व्यक्ति के लिए उचित

है, क्योंकि कितनी भी चर्चा की जाए, वह मनुष्य को इस सरल नियम के