22 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आगे नहीं ले जा सकती है कि वह ‘ईश्वर से डरे और उसकी आज्ञा का
पालन करे।’ यह उपदेश लेखक ने सोलोमन के मुख से दिया है और इसलिए
वह, अन्यायपूर्ण पद्धति से नहीं, बल्कि धर्म के प्रति प्राचीन दृष्टिकोण का
निश्चित ही प्रतिनिधित्व करती है, जिसका दुर्भाग्य से आधुनिक काल में
महत्व धीरे-धीरे कम हो गया।’’
मत-भिन्नता का छठा मुद्दा धर्म में आस्था का जो स्थान है, उससे संबंधित है। प्राचीन समाज मेंµ
‘‘यदि स्पष्ट कहा जाए, तो संस्कार तथा व्यावहारिक परंपराएं, यही प्राचीन
धर्म का कुल-मिलाकर सार था प्राचीन काम में धर्म व्यावहारिक रूप से
आस्था की पद्धति नहीं थी, इसे एक स्थिर पारंपरिक क्रिया की संस्था माना
जाता था, जिसमें समाज का प्रत्येक सदस्य निर्भय सहमति व्यक्त करता
था। मनुष्य मनुष्य नहीं होगा यदि वह बिना किसी तर्क के कोई कार्य करने
के लिए सम्मति दे_ परंतु प्राचीन धर्म में पहले तर्कों की सिद्धांत रूप में
रचना करके बाद में उस पर आचरण नहीं किया गया। इसके विपरीत,
पहले आचरण किया गया और बाद में सिद्धांतों की रचना की गई। मनुष्यों
ने सर्वसाधारण तत्वों को शब्दों में व्यक्त करने के पहले आचार-संहिता के
नियम बनाए। राजनीतिक संस्थाएं धार्मिक सिद्धांतों से पुरानी हैं और इसी
प्रकार धार्मिक संस्थाएं धार्मिक सिद्धांतों से पुरानी हैं। इस तुलना का चयन
किसी ने अपनी मर्जी से नहीं किया है, क्योंकि प्राचीन समाज में वास्तव
में धार्मिक तथा राजनीतिक संस्थाओं में परिपूर्ण समानता थी। प्रत्येक क्षेत्र
में पूर्व प्रथा तथा संस्कारों का भारी महत्व था। परंतु इस पूर्व परंपरा का
पालन क्यों किया जाता है, इसका स्पष्टीकरण केवल उसकी प्रथम स्थापना
की किंवदंती बताकर दिया जाता था। कोई भी प्रथा, एक बाद स्थापित हो
जाए, उसे अधिकार-युक्त माना जाता था, और उसके लिए किसी प्रमाण की
आवश्यकता नहीं होती थी। समाज के नियम पूर्व निर्णयों पर आधारित होते
थे और समाज का अस्तित्व निरंतर बना रहा है, और इस बात को न्यायसंगत
ठहराने के लिए यही कारण पर्याप्त था कि एक प्रथा स्थापित हो जाने के
बाद उसे जारी क्यों न रखा जाए।’’
मत-भिन्न्ता का सातवां मुद्दा धर्म से व्यक्तिगत विश्वास से संबंधित है। प्राचीन समाज मेंµ
‘‘मनुष्य जिस समाज में जन्म लेता है, उस समाज के संगठित सामाजिक जीवन
का धर्म एक हिस्सा था और मनुष्य अपने जीवन में उसका अवचेतनावस्था