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हिंदुत्व का दर्शन

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में उसी प्रकार पालन करता रहता था, जिस प्रकार किसी समाज में रह रहा

व्यक्ति उसकी व्यावहारिक प्रथाओं का पालन करता है। जिस प्रकार व्यक्ति

राज्य की अनेक प्रथाओं को मानकर उनका अनुसरण करता है, उसी प्रकार

देवताओं तथा उनकी उपासना को भी स्वीकार करता है और यदि उन्होंने

उस पर कोई बहस की अथवा संदेह प्रकट किया तो वह भी इसी धारणा

पर आधारित होता था कि पारंपरिक प्रथाएं स्थिर हैं और उससे परे हटकर

कोई भी बहस नहीं की जानी चाहिए और उन्हें किसी भी तर्क के आधार

पर बदलने की स्वतंत्रता नहीं थी। हमारे लिए आधुनिक धर्म सर्वप्रथम

वैयक्तिक विश्वास तथा तर्कपूर्ण श्रद्धा की बात है, किन्तु प्राचीन लोगों के

लिए वह प्रत्येक नागरिक के सार्वजनिक जीवन का भाग था, जो किन्ही

निश्चित रूपों में बंधा था और जिसे समझाने की उसे जरूरत नहीं थी और

न ही उसे उसकी आलोचना अथवा उपेक्षा करने की स्वतंत्रता थी। धार्मिक

अवज्ञा शासन के विरुद्ध अपराध माना जाता था। अगर पवित्र परंपराओं से

खिलवाड़ किया जाए तो समाज का आधार भी टूट जाता है, और ईश्वर की

कृपा से भी वंचित होना पड़ता है। परंतु जब तक मनुष्य निर्देशित आज्ञाओं

का पालन करता था, तब तक उसे सच्चे धार्मिक मनुष्य के रूप में मान्यता

थी और उसे किसी से यह नहीं पूछना पड़ता था कि धर्म उसके अंतःकरण

में कितना बस गया है अथवा उसके विवेक पर उसका क्या प्रभाव पड़ा है।

राजनीतिक कर्तव्यों की तरह, जिसका वह एक अविभाजित भाग था, धर्म

भी पूर्णतः बाह्य आचरण के कुछ निश्चित नियमों के पालन से ही ग्रहण

किया जाता था।’’

मतभेद का आठवां मुद्दा, देवता के समाज तथा मनुष्य के साथ संबंध और देवता के अधिकारों के संदर्भ में समाज के साथ संबंधों के बारे में है।

पहले हम देवता के समाज के साथ संबंधों में मत-भिन्न्ता को देखें। इस संबंध में हमारे लिए तीन बातों को ध्यान में रखना आवश्यक है।

प्राचीन विश्व की श्रृद्धृ ने-

‘‘भगवान से प्राकृतिक सुखों से अधिक कुछ नहीं मांगा।.......भगवान के

सम्मुख जो उत्तम मनोकामनाएं रखी जाती थीं, वह सुखी संसारिक जीवन,

विशेषकर भौतिक आवश्यकताएं ही होती थीं।’’

प्राचीन समाज जो चीजें मांगता था और विश्वास रखता था कि वह उसे अपने देवता से मिलेंगी, वे मुख्य रूप से निम्नलिखित होती थींः