24 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
‘‘भरपूर उपज, शत्रु के विरुद्ध सहायता और नैसर्गिक आपत्तियों में देववाणी
द्वारा उपदेश अथवा किसी वक्ता द्वारा सलाह।’’
प्राचीन संसार मेंµ
‘‘धर्म एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि सारे समाज का विषय था। पूरे समाज
को, न कि एक व्यक्ति को देवता के स्थिर और कभी असफल न होने
वाली भूमिका में विश्वास था।’’
अब हम देवता के साथ संबंधों के अंतर को देखें।
‘‘प्रत्येक व्यक्ति के कल्याण की ओर विशेष रूप से ध्यान देना मूर्तिपूजा के
देवताओं का कार्य नहीं था। यह सच है कि लोग अपनी निजी बातें देवता के
सामने रखते और उससे प्रार्थना तथा इच्छा व्यक्त करके व्यक्तिगत आशीर्वाद
मांगते थे। लेकिन ऐसा वे इस प्रकार करते थे जैसे किसी राजा से कोई निजी
उपहार की मांग करता है अथवा जैसे कोई पुत्र अपने पिता से कुछ उपहार
मांगते हैं और यह अपेक्षा नहीं करता कि वह सब मिल जाएगा, जिसकी
वह मांग कर रहा है। ऐसे प्रसंगों पर देवता यदि कुछ दे भी दे तो उसे एक
निजी उपहार ही माना जाता था और देवता के समाज के प्रमुख के रूप में
जो योग्य कर्तव्य थे, उसका यह भाग नहीं था।
मनुष्य के नागरिक जीवन पर देवताओं का नियंत्रण था। वे उसे सार्वजनिक
लाभ, अनाज की वार्षिक उपज तथा भरपूर फसल, राष्ट्रीय शांति अथवा
शत्रु पर विजय आदि लाभ पहुंचाते थे। परंतु वे प्रत्येक निजी आवश्यकता
में सहायता करेंगे ही, यह आवश्यक नहीं था, और सबसे महत्वपूर्ण बात
यह थी कि देवता किसी भी व्यक्ति की उन कामों में मदद नहीं करते थे,
जो समूचे समाज के हितों के विरुद्ध होते थे। इसलिए उन सभी संभावित
आवश्यकताओं तथा इच्छाओं का, जिन्हें धर्म पूरा करेगा अथवा नहीं करेगा।
एक अलग क्षेत्र बना हुआ था।’’
अब, देवता तथा समाज की मनुष्य के प्रति जो भावना है, उसके अंतर को देखते हैं।
प्राचीन संसार में समाज का व्यक्तिगत कल्याण से लगाव नहीं होता था। निस्संदेह देवता समाज से बंधा होता था। परंतुµ
‘‘देवता तथा उसके उपासकों में ऐसा कोई समझौता नहीं था कि समाज में
प्रत्येक सदस्य की निजी चिंता को देवता अपनी चिंता मानें।