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हिंदुत्व का दर्शन

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प्रकार इस आदर्श में भी है। जो लोग धर्म के महत्व को नकारते हैं, वे लोग यह बात भूल जाते हैं। इतना ही नहीं, इस आदर्श के पीछे कितनी विराट शक्ति तथा मान्यता होती है, यह बात भी वे समझ नहीं सकते। शायद ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें आदर्श और वास्तविक, दोनों में अंतर दिखाई देता है और ऐसा हमेशा ही होता है, चाहे हमारा आदर्श धार्मिक हो अथवा लैकिक। लेकिन दोनों आदर्शों की तुलनात्मक शक्ति नापने की एक और कसौटी है वह है, मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा को कुचलने की उनकी शक्ति। आदर्श का संबंध कुछ ऐसी चीजों से होता है, जो दूरवर्ती होती है और मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा का संबंध उसके प्रति समीप के वर्तमान से होता है अब जब हम दोनों आदर्शों को मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा पर छोड़ देते हैं, तो दोनों में ही स्पष्ट रूप से भिन्नता नजर आती है। धार्मिक आदर्शों की आवश्यकताओं के सामने मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा अपने-आप झुक जाती है, चाहे दोनों आदर्श एक-दूसरे के विरोधी हों। दूसरी ओर, यदि दो आदर्शों में संघर्ष होता है तब मनुष्य की स्वाभाविक अंतःप्रेरणा लौकिक आदर्श के सामने नहीं झुकती। इसका अर्थ है कि धार्मिक आदर्श का बिना किसी ऐच्छिक लाभ की आंकाक्षा के मानवता पर अधिकार होता है। यही बात शुद्ध लौकिक आदर्श के बारे में नहीं कही जा सकती। उसका प्रभाव उसके भौतिक लाभ प्राप्त करा देने की शक्ति पर निर्भर होता है। मानव बुद्धि पर इन दोनों आदर्शों का जो प्रभाव और अधिकार है, उसमें कितना अंतर है, यह बात इससे स्पष्ट होती है। जब तक उनमें विश्वास है, धार्मिक आदर्श कभी भी अपने कार्य में असफल नहीं होता। धर्म की उपेक्षा करना सजीव संवेदनाओं की उपेक्षा करना है।

फिर, सभी धर्म सत्य तथा उत्तम हैं, ऐसा विचार करना निश्चित रूप से अनुकरण की दृष्टि से गलत है। हमें यह बात बहुत खेद के साथ कहनी पड़ती है कि यह विचार तुलनात्मक धर्म के अध्ययन से उत्पन्न होता है। परंतु तुलनात्मक धर्म ने मानवता की एक बहुत ही महान सेवा की है। सभी लौकिक धर्मों का यह कहना था कि वे ही केवल मात्र उत्तम धर्म है उनका यह अधिकार तथा गर्व इस अध्ययन से भंग हो गया। यद्यपि यह सच है कि तुलनात्मक धर्म के अध्ययन ने केवल मात्र अवैचारिक और मठाधीशों के एकाधिकार के आधार सत्य धर्म तथा असत्य धर्म में जो अनियमित तथा संदिग्ध भेद बना हुआ था, उसे निरस्त कर दिया_ और दूसरी ओर इसके कारण धर्म के संबंध में झूठी धारणाएं भी बनीं। इसमें सबसे हानिकारक धारणा वह है, जिसका मैंने इसके पूर्व उल्लेख किया है। वह धारणा यह है कि सभी धर्म समान रूप से उत्तम हैं और उनमें कोई भेद करने की