30 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
आवश्यकता नहीं। इससे बड़ी गलती कोई दूसरी नहीं हो सकती। धर्म एक व्यवस्था तथा शक्ति है और सभी सामाजिक प्रभावों तथा संस्थाओं के समान वह भी अपने प्रभाव में आबद्ध समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है। जैसा कि प्रो. टीले ख्1, ने स्पष्ट किया है, धर्मµ
‘‘मानव इतिहास का एक अत्यंत शक्तिशाली माध्यम है, जिसने राष्ट्रों का
निर्माण तथा विध्वंस किया, साम्राज्यों को एक साथ जोड़ा तो दूसरी ओर
विभाजित भी किया है_ उसने सबसे नृशंस प्रथाओं तथा अन्यायी कृत्यों
को मान्यता दी, सबसे पराक्रमी कार्य, आत्मत्याग और निष्ठा की भावना
को प्रेरित किया है_ धर्म के कारण एक ओर क्लेश, विद्रोह तथा रक्तरंजित
युद्ध हुआ, तो दूसरी ओर धर्म के कारण राष्ट्रों में स्वत्रंता, सुख और शांति
भी आई। वह एक स्थान पर जुल्मों का साथ देता है, तो दूसरे स्थान पर
गुलामी की जंजीरे तोड़ देता है। कभी एक नई देदीप्यमान सभ्यता का
निर्माण करता है, तो कभी-कभी विज्ञान, कला आदि के विकास का सबसे
बड़ा शत्रु बनता है।’’
धर्म की शक्ति के परिणामों में इतनी विलक्षण विसंगति के बावजूद वह जो रूप धारण करता है तथा जो आदर्श निश्चित करता है, उसे बिना किसी परीक्षण के उत्तम माना जा सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि किसी धर्म ने दैवी शासन की योजना के रूप में कौन से सामाजिक आदर्श प्रदान किए हैं। यह एक ऐसा प्रश्न है, जिस पर तुलनात्मक धर्म के विज्ञान ने विचार नहीं किया। वस्तुतः यह एक ऐसा प्रश्न है, जो तुलनात्मक धर्म का जहां अंत होता है, वहीं से आरंभ होता है। यद्यपि धर्म अनेक हैं, परंतु वे सभी समान रूप से उत्तम हैं, ऐसा कहकर हिन्दु लोग इस प्रश्न का उत्तर टाल रहे हैं। परंतु वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है।
हिन्दु समाज हिंदुत्व के दर्शन का परीक्षण करने की बात को कितना भी टालने का प्रयास करे, ऐसे परीक्षण से भाग नहीं सकता। उसे इसका सामना करना ही होगा।
- ट्री आफ लाइफ, पृष्ठ 5