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हिंदुत्व का दर्शन

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III

अब विषय पर आते हैं। हिंदु धर्म के दर्शन के परीक्षण के लिए मैं न्याय की कसौटी तथा उपयुक्तता की कसौटी, इन दोनों कसौटियों को लागू करना चाहूंगा। प्रथम, न्याय की कसौटी को लागू करूंगा। ऐसा करने से पहले मैं, न्याय के तत्व से मेरा क्या अर्थ है, यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा। इसकी व्याख्या प्रो. बर्गबान ख्1, से अच्छी किसी ने नहीं की है। जैसा कि उन्होंने बताया है, न्याय का सिद्धांत एक सारभूत सिद्धांत है और उसमें लगभग उन सभी सिद्धांतों का समावेश है, जो नैतिक व्यवस्था का आधार बने हैं। न्याय ने सदा ही समानता तथा (कार्य के अनुरूप) ‘क्षतिपूर्ति’ के सिद्धांत को प्रतिपादित किया है। निष्पक्षता से समानता उभरी है। नियम और नियमन, न्यायपूर्ण और नीतिपरायणता, ये मूल्य के रूप में समानता से जुड़े हुए हैं यदि सभी मनुष्य समान हैं, तब वे सभी एक समान तत्व के हैं और यह समान तत्व उन्हें समान मौलिक अधिकार तथा समान स्वतंत्रता के योग्य बनाता है।

संक्षेप में न्याय का दूसरा सरल नाम है स्वतंत्रता, समानता और भ्रातृत्व और हिंदु धर्म को परखने के लिए मैं न्याय का इसी अर्थ में एक कसौटी के रूप में प्रयोग करूंगा ख्2, ।

इनमें से कौन से सिद्धांत को हिंदू धर्म मान्य करता है? हम एक-एक प्रश्न का विचार करें।

क्या हिंदू धर्म समानता को स्वीकार करता है?

इस प्रश्न से किसी के भी मन में तुरंत जाति-व्यवस्था का विचार आता है। जाति-व्यवस्था की एक विचित्र विशेषता यह है कि विभिन्न जातियां एक समान स्तर पर नहीं खड़ी हैं। यह वह व्यवस्था है, जिसमें विभिन्न जातियों का स्थान एक-दूसरे के ऊपर ऊर्ध्वाकार क्रम में निश्चित किया गया है। कदाचित मनु जाति के निर्माण के लिए जिम्मेदार न हों, परंतु मनु ने वर्ण की पवित्रता का उपदेश दिया है। जैसा कि मैंने इससे पूर्व स्पष्ट किया है, वर्ण-व्यवस्था जाति की जननी है और इस अर्थ में मनु जाति-व्यवस्था का जनक न भी हो परंतु उसके पूर्वज होने का उस पर निश्चित ही आरोप लगाया जा सकता है। जाति-व्यवस्था के संबंध में मनु का दोष क्या है, इसके बारे में चाहे जो स्थिति हो, परंतु इस बारे में कोई प्रश्न

  1. टू मोरेलिटीज पेज।

  2. न्याय की एक अन्य व्याख्या के लिए जे.एस. मिल की यूटिलिटेरियनिज्म का संदर्भ देखें।