32 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ही नहीं उठता कि श्रेणीकरण और कोटि-निर्धारण का सिद्धांत प्रदान करने के लिए मनु ही जिम्मेदार है।
मनु की इस योजना में ब्राह्मण का स्थान प्रथम श्रेणी पर है। उसके नीचे है क्षत्रिय, क्षत्रिय के नीचे है वैश्य, वैश्य के नीचे हैं शूद्र और शूद्र के नीचे है अतिशूद्र। क्रमिक श्रेणी की यह व्यवस्था असमानता के सिद्धांत को लागू करने का एक दूसरा सीधा तरीका है, ताकि सही रूप में यह कहा जा सके कि हिंदू धर्म समानता के सिद्धांत को मान्यता नहीं देता। सामाजिक प्रतिष्ठा की यह असमानता राज दरबार के समारोह में चलने वाले दरबार के अधिकारियों की श्रेणी में दिखाई देने वाली असमानता के समान नहीं है। समाज के विभिन्न वर्गों द्वारा हर समय, हर स्थान पर तथा सभी कार्यों में पालन की जाने वाली सामाजिक संबंधों की यह स्थायी व्यवस्था है, जिसका सभी अमल करते हैं। इस बात को स्पष्ट करने के लिए काफी समय लग सकता है कि मनु ने कैसे जीवन का प्रत्येक अवस्था में असमानता के तत्व को लागू किया और उसे जीवन की एक सजीव शक्ति बनाया। परंतु फिर भी मैं गुलामी, विवाद तथा विधि के नियमों जैसे कुछ उदाहरण देकर यह बात स्पष्ट करना चाहूंगा।
मनु ने गुलामी को मान्यता प्रदान की है ख्1, । परंतु उसने उसे शूद्र तक ही सीमित रखा। केवल शूद्रों को ही शेष तीन ऊंचे वर्णों का गुलाम बनाया जा सकता था। परंतु यह ऊंचे वर्ण शूद्रों के गुलाम नहीं हो सकते थे।
परंतु ऐसा प्रमाणित होता है किस व्यवहार में यह व्यवस्था मनु के नियम से भिन्न थी और केवल शूद्र ही गुलाम नहीं होते थे, किन्तु अन्य तीन वर्णों के लोग भी गुलाम होते थे। यह स्थिति तब स्पष्ट हो गई, जब नारद नाम के मनु के उत्तराधिकारी ने एक नया नियम बनाया ख्2, । नारद का यह नया नियम निम्न प्रकार है-
5.39. जब कोई मनुष्य अपनी जाति विशेष के कर्तव्यों का उल्लंघन करता
है, उसे छोड़कर चार वर्णों पर नीचे से ऊपर उल्टे क्रम में गुलामी लागू
नहीं की जा सकती। इस संबंध में यह गुलामी किसी स्त्री की स्थिति के
समान है।
गुलामी को मान्यता प्रदान करना बहुत बुरी बात थी। परंतु यदि गुलामी को अपना रास्ता स्वयं निर्धारित करने की आजादी दी जाए, तो उससे कम-से-कम एक
- मनु ने सात प्रकार के गुलाम बताए हैं (8.415)। नारद ने 15 प्रकार के गुलाम बताए हैं (5.25)।
- याज्ञवल्क्य ने भी वैसे नियम बताए हैं (2.183) जो मनु के समान प्रमाणित हैं।