हिंदुत्व का दर्शन
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2.77. प्राणियों के स्वामी ने तीनों वेदों से, अचिन्त्य रूप में, एक के बाद एक तीन अवर्णनीय शब्द उन्नत किए, जो तत् शब्द से शुरू होते थे और उन्हें सावित्री अथवा गायत्री शीर्षक दिया गया।
2.78. जो पुरोहित, वेद जानता है और उसका सुबह-शाम पाठन करता है तथा उस पवित्र पाठ के पहले उन तीन शब्दों का उच्चारण करता है, उसे वेदों में निहित पुण्य प्राप्त होगा।
2.79. और एक द्विज व्यक्ति, जो इन तीनों (अथवा ओम, व्याहृति एवं गायत्री) का एक हजार बार उच्चारण करेगा, उसे एक माह के भीतर उसी प्रकार घोर अपराध से मुक्ति मिलेगी, जिस प्रकार सांप केंचुली से मुक्त होता है।
2.80. पुरोहित, क्षत्रिय तथा वैश्य, जो भी इन गूढ़ पाठों की उपेक्षा करेगा, और उचित समय पर अपनी विशेष धार्मिक विधि नहीं करेगा, उसे सदाचारी लोग निन्दनीय मानेंगे।
2.81. महान अपरिवर्तनीय शब्दों के पहले उन तीन अर्थी अक्षरों को और उसके बाद गायत्री को, जिससे त्रिपदा बनती है, वेदों का मुख अथवा मुख्य भाग माना जाना चाहिए।
2.82. जो कोई भी प्रतिदिन, तीन वर्षों तक, बिना उपेक्षा किए उन पवित्र पाठों का पठन करेगा, उसे दैवी सार प्राप्त होगा और वह वायु की तरह मुक्त संचार कर सकेगा तथा उसे आकाश का रूप प्राप्त होगा।
2.83. तीन अक्षरों का वह पद उस सर्वश्रेष्ठ का प्रतीक है। श्वास रोककर ईश्वर पर मन केंद्रित करना, यह सर्वोच्च भक्ति है। परंतु गायत्री से बढ़कर श्रेष्ठ कुछ भी नहीं। सत्य को घोषित करना मौन को धारण करने से श्रेष्ठ है।
2.84. वेदों में निहित सभी संस्कार अग्नि को आहुति और पवित्र त्याग में समाप्त होते हैं। परंतु जो अमर्त्य है वह अक्षर ओउम है, क्योंकि वह ईश्वर का प्रतीक है, और जो प्रजापति है।
2.85. उस पवित्र नाम का स्मरण करना या दोहराना किसी यज्ञ करने से दस गुना श्रेष्ठ है और जब यह नाम स्मरण कोई दूसरा व्यक्ति नहीं सुनता हो, तब यही कार्य सौ गुना श्रेष्ठ बन जाता है और जब इस नाम का मन-ही-मन में मानसिक रूप से स्मरण किया जाए तब वह एक हजार गुना श्रेष्ठ होता है।
2.86. विधि यज्ञों के सहित भी जो चार पाक-यज्ञ हैं, वे भी जप-यज्ञ के