हिंदुत्व का दर्शन
43
6.3. काश्तकारी से उत्पन्न अन्न का त्याग करते हुए, अपनी सभी वस्तुओं
का त्याग करते हुए, तथा अपनी पत्नी को पुत्रों के उत्तरदायित्व में सौंपकर
अथवा उसे साथ लेकर वह जंगल में चला जाए।
6.33. परंतु इस प्रकार अपने नैसर्गिक जीवन का तीसरा भाग जंगल में गुजार
कर अपने जीवन के चौथे हिस्से में सभी सांसारिक संबंधों का त्याग करते
हुए वह साधु के रूप में जीवन व्यतीत करे।
इन नियमों में सम्मिलित असमानता यद्यपि पूर्ण रूप से स्पष्ट नहीं है, परंतु यह वास्तविक है। हम यह देख सकते हैं कि यह सभी संस्कार और आश्रम-व्यवस्था केवल द्विज-जन्मे लोगों तक ही सीमित है। शूद्रों को इनसे वंचित रखा गया है। ख्1, यद्यपि मनु को उनके समारोह मनाने में कोई आपत्ति नहीं है, परंतु उसे अपने समारोह में उनके द्वारा पवित्र मंत्रों का प्रयोग करने पर आपत्ति है। इस विषय पर मनु ने कहा हैः
10.127. वे शूद्र जो अपने संपूर्ण कर्तव्य निभाने को उत्सुक हैं, और जानते
हैं कि उन्हेंं निभाना चाहिए, वे अपने पारिवारिक धार्मिक संस्कारों में उत्तम
लोगों का अनुसरण कर सकते हैं, परंतु पवित्र मंत्रों का पाठ किए बिना।
केवल उन मंत्रों का उपयोग करें, जिसमें नमस्कार तथा स्तुति का समावेश है,
जिसमें उन्हें केवल प्रशंसा मिल सके, परंतु उनके द्वारा कोई पाप न हो।
स्त्रियों के लिए निम्नलिखित मंत्र को देखेंः
2.66. यज्ञोपवीत-संस्कार को छोड़कर स्त्रियों को बाकी समारोह-क्रियाएं
अपनी आयु तथा क्रम से वेद-पाठ किए बिना करनी चाहिएं जिससे उनका
शरार परिपूर्ण बन सके।
मनु ने शूद्रों को धार्मिक संस्कार-विधियों के लाभ से वंचित क्यों रखा? शूद्रों को संन्यासी बनने के लिए उसने जो निषेध किया है, यह बात भ्रमित करने वाली है। संन्यास का मतलब है आत्म-त्याग और सभी सांसारिक सुखों का परित्याग। कानून की भाषा में संन्यास का अर्थ एक प्रकार से नागरिक जीवन की मृत्यु के समान होता है। इस तरह जब मनुष्य संन्यासी बन जाता है, उसी क्षण से उसे मृत मानकर उसका वारिस तुरंत उसके स्थान पर विराजमान होता है। अगर कोई शूद्र संन्यासी बन जाए तब उसके साथ भी यही स्थिति हो सकती है। ऐसी स्थिति से उस शूद्र को छोड़कर और किसी को कोई नुकसान नहीं हो सकता। फिर यह रोक क्यों? यह एक महत्वपूर्ण विषय है और
- स्त्रियों को भी वंचित रखा है।