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हिंदुत्व का दर्शन

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इस तरह से आपको हिंदुत्व के दर्शन में सामाजिक तथा धार्मिक असमानता, दोनों का समावेश मिलेगा।

मनुष्य को अपने पापों से मुक्त होने के प्रयास को रोकना! मनुष्य को ईश्वर के समीप आने पर रोक! किसी भी बृद्धिमान व्यक्ति को ऐसे नियम घृणित लगने चाहिएं और विकृत मस्तिष्क की निशानी लगने चाहिएं। हिंदु धर्म केवल समानता को ही नकारता है, ऐसा नहीं है, परंतु वह मानव व्यक्तित्व की पवित्रता को ही नकारता है। यह इसका एक चकित कर देने वाला उदाहरण है।

बात यहीं समाप्त नहीं होती क्योंकि मनु केवल मानव-व्यक्त्वि को अमान्य करने पर ही नहीं रुका। उसने जान-बूझकर मानव-व्यक्त्वि का अधःपतन किया। हिंदुत्व के दर्शन के इस पहलू को स्पष्ट करने के लिए मैं केवल दो उदाहरण देता हूं।

जो लोग जाति-व्यवस्था का अध्ययन करते हैं, वे उसकी उत्पत्ति के बारे में पूछताछ करें, यह स्वाभाविक है। जाति-व्यवस्था का जनक होने के कारण विभिन्न जातियों की उत्पत्ति के लिए मनु को स्पष्टीकरण देना होगा। मनु ने उसकी उत्पत्ति क्या बताई है? उसका स्पष्टीकरण सरल है। वह कहता है कि किस मूल चार वर्गों को छोड़कर सभी शेष जातियां उनसे ही जन्मी हैं। वह कहता है कि ये जातियां मूल चार वर्णों के स्त्री-पुरुषों के बीच होने वाले अविवाहित संबंधों तथा व्यभिचार की उपज है। इन चार वर्णों के स्त्री-पुरुष में अनैतिकता तथा स्वेच्छाचार इतना असीमित हो गया कि उसके कारण इन असंख्य आत्माओं से भी अनगिनत जातियों का उदय हुआ। मनु ने इन चार मूल वर्णों के स्त्री-पुरुषों के चरित्र पर बिना सोचे-विचारे वे असभ्य आरोप लगाए क्योंकि अगर चांडाल-अछूतों का पुराना नाम-ब्राह्मण स्त्री और वैश्य पुरुष के व्यभिचार का परिणाम हैं, तो यह बात स्पष्ट है कि चांडालों की इतनी बड़ी संख्या देखकर यह माना जाएगा कि प्रत्येक ब्राह्मण स्त्री वैश्य तथा दुराचारिणी थी और प्रत्येक वैश्य पुरुष सब-कुछ छोड़कर व्यभिचारी जीवन व्यतीत करता था। ऐसा प्रतीत होता है कि किस विभिन्न जातियों को हीन बनाने की अपनी मूर्ख लालसा की पूर्ति के लिए इन जातियों को नीच उत्पत्ति का कारण बताकर मनु जान-बूझकर ऐतिहासिक तथ्यों को विकृत बना रहा है। इस संबंध में मैं केवल दो उदाहरण देता हूं। हम मनु की ‘मगध’ और ‘वैदेहिक’ जातियों की उत्पत्ति लेते हैं और महान व्याकरणाचार्य पाणिनि की उन्हीं जातियों को दी गई उत्पत्ति से उसकी तुलना करते हैं। मनु का कहना है कि ‘मगध’ जाति वैश्य पुरुष और क्षत्रिय स्त्री के संभोग से उत्पन्न हुई है। मनु कहता है किस ‘वैदेहिक’ जाति वैश्य पुरुष और ब्राह्मण स्त्री के संभोग से उत्पन्न हुई। अब पाणिनि को देखें। पाणिनि कहते हैं कि ‘मगध’ का अर्थ