हिंदुत्व का दर्शन
श्लोकों के उदधृत करता हूं।
नामकरण-समारोह के लिए मनु कहता हैः
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2.30. पिता को बच्चे के जन्म के बाद दसवें अथवा बारहवें दिन, अथवा
शुभ ग्रह के अवसर पर अथवा शुभ तिथ पर नामधेय (बच्चे का नामकरण
संस्कार) करना चाहिए।
2.31. ब्राह्मण के नाम का पहला भाग शुभ-सूचक होना चाहिए, क्षत्रिय
के नाम का शक्ति के साथ संबंध हो और वैश्य का संपत्ति के साथ, परंतु
शूद्र के नाम का पहला भाग कोई ऐसा हो जो घृणा व्यक्त करे।
2.32. ब्राह्मण के नाम का दूसरा भाग ऐसा शब्द हो जो प्रसन्नता व्यक्त करें। क्षत्रिय
का नाम रक्षा व्यक्त करे, वैश्य का समृद्धि और शुद्र का सेवा व्यक्त करे।
किसी शूद्र का नाम उच्च भावना का प्रतीक हो, यह बात मनु सहन नहीं कर सकता। शूद्र वास्तविक स्थिति में तथा नाम से भी घृणित होना चाहिए।
हिंदु धर्म किस प्रकार से सामाजिक तथा धार्मिक, दोनों ही समानताओं को नकारता है, और यह किस प्रकार के मानव-व्यक्त्वि के अधःपतन का प्रतीक है, इस बात को स्पष्ट करने के लिए हमने बहुत-कुछ कहा है।
क्या हिंदु धर्म स्वतंत्रता को मान्यता देता है?
स्वतंत्रता को वास्तविक बनाने के लिए उसके साथ कुछ सामाजिक शर्तें भी जुड़ी होनी चाहिएं। ख्1,
प्रथम, सामाजिक समानता का होना आवश्यक है।
‘‘विशेष अधिकार से सामाजिक कार्यों का संतुलन उन पर अधिकार रखने
वालों के पक्ष में झुका जाता है। नागरिकों के सामाजिक अधिकारों में जितनी
अधिक समानता होगी, अपनी स्वतंत्रता का वे उतना ही अधिक उपभोग
कर सकेंगे। .........अगर स्वतंत्रता को अपना लक्ष्य प्राप्त करना है, तो यह
आवश्यक है कि समानता हो।’’
दूसरे, आर्थिक सुरक्षा होनी चाहिए।
‘‘मनुष्य को अपनी रुचि के व्यवसाय का चयन करने की स्वतंत्रता होनी
चाहिए, और यदि उसे रोजगार की सुरक्षा न हो तो वह मानसिक तथा
शारीरिक गुलामी का शिकार बन जाता है, जो स्वतंत्रता की मूल भावना के
- लिबर्टी इन दि मार्डन स्टेट, लास्की