48 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
ही प्रतिकूल है। भविष्य के प्रति निरंतर भय, होने वाली हानि की आशंका,
सुख और सौंदर्य की प्राप्ति के लिए किए गए प्रयास की विफलता, इस
सबसे यह बात स्पष्ट होती है कि आर्थिक सुरक्षा के बिना स्वतंत्रता निरर्थक
है। व्यक्ति स्वतंत्र होते हुए भी स्वतंत्रता के उद्देश्य को समझने में असमर्थ
हो सकता है।’’
तीसरे, ज्ञान का सब लोगों के लिए उपलब्ध होना आवश्यक है। इस जटिल संसार में मनुष्य हमेशा संकटों से घिरा रहता है और उसके लिए अपनी स्वतंत्रता खोए बगैर अपना रास्ता तय करना जरूरी है।
‘‘जब तक मन को स्वतंत्रता का उपयोग करने की शिक्षा न दी जाए, जब
तक स्वतंत्रता का कोई मूल्य ही नही रहता। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए
शिक्षा प्राप्त करने का मनुष्य का अधिकार उसकी स्वतंत्रता के लिए मूलभूत
अधिकार बन जाता है। मनुष्य को ज्ञान से वंचित रखकर आप उसे अनिवार्य
रूप से उन लोगों का गुलाम बना देंगे, जो उससे अधिक सौभाग्यशाली हैं।.
......ज्ञान से वंचित रखने का मतलब है, उस शक्ति को नकारना है, जिससे
स्वतंत्रता का महान उद्देश्यों के लिए उपयोग किया जाता है। एक अज्ञानी
मनुष्य स्वतंत्र हो सकता है।.....(परंतु) वह अपनी स्वतंत्रता का उपयोग नहीं
कर सकता, जिससे कि वह अपनी प्रसन्नता के प्रति आश्वस्त हो सके।’’
हिंदु धर्म इनमें से कौन-सी कसौटियों की पूर्ति करता है? हिंदु धर्म किसी प्रकार से समानता को नकारता है, यह बात हमने पहले ही स्पष्ट की है। वह विशेष अधिकार और असमानता को स्वीकार करता है। इस प्रकार हिंदु धर्म में स्वतंत्रता की आवश्यक प्रथम कसौटी इसकी अनुपस्थिति प्रकट करना है।
आर्थिक सुरक्षा के संबंध में हिंदु धर्म में तीन बातें दिखाई देती हैं। प्रथम, हिंदू धर्म व्यवसाय की स्वतंत्रता को नकारता है। मनु की योजना में प्रत्येक मनुष्य के लिए उसके जन्म के पहले ही व्यवसाय निश्चित कर दिया गया है। हिंदू धर्म में इसके चयन का कोई अवसर नहीं है जो व्यवसाय पूर्व निश्चित किए जाते हैं। उनका मनुष्य की योग्यता और पसंद के साथ कोई संबंध नहीं है।
दूसरे, हिंदू धर्म मनुष्य को दूसरों द्वारा चुने गए उद्देश्य की पूर्ति के लिए कार्य करने के लिए बाध्य करता हैं मनु शूद्र से कहता है कि उसका जन्म ऊंचे वर्णों की सेवा करने के लिए ही हुआ है। मनु उनको उसी को अपना आदर्श बनाने के लिए बाध्य करता है। मनु द्वारा बनाए निम्नलिखित नियमों को हम देखेंः