50 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
महत्व के संदर्भ में ये नियम शूद्रों की आर्थिक स्वतंत्रता पर बंधन डालते हैं। मनु कहता है कि शूद्र केवल सेवा करें। इस बात में शिकायत करने योग्य शायद ज्यादा कुछ न हो, परंतु गलती वहां हैं, जहां नियम नियम दूसरों की सेवा करने को कहते हैं। वह अपनी सेवा नहीं कर सकता, जिसका मतलब है, वह आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं कर सकता, उसे हमेशा के लिए दूसरों पर आर्थिक दृष्टि से निर्भर रहना पड़ेगा। क्योंकि मनु ने कहा हैः
1.91. ब्रह्मा ने शूद्र को एक सबसे प्रमुख कार्य सौपा है, वह है, बिना
किसी उपेक्षा भाव के उक्त तीनों वर्णों की सेवा करना।
तीसरे स्थान पर, शूद्रों के लिए हिंदू धर्म में संपत्ति संचित करने के लिए कोई अवसर नहीं है। शूद्रों को उसकी सेवा करने के लिए तीनों उच्च वर्णों द्वारा वेतन देने के संबंध में मनु के नियम बहुत ही आदर्शात्मक हैं। शूद्रों को वेतन देने के प्रश्न पर मनु कहता हैः
10.124. शूद्र की क्षमता, उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर
लोगों की संख्या को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक
संपत्ति से उचित वेतन दें।
10.125. शूद्र को जूठा भोजन, पुराने वस्त्र, अन्न का युआल तथा पुराने बर्तन
आदि देने चाहिए।
यह मनु का वेतन संबंधी कानून है। यह न्यूनतम वेतन का कानून नहीं यह अधिकतम वेतन का कानून है। यह एक ऐसा लौहे-कानून भी था, जिसे इतने निम्न स्तर पर निश्चित किया गया था कि शूद्र के संपत्ति एकत्रित करने और आर्थिक सुरक्षा प्राप्त करने का कोई खतरा नहीं था। परंतु मनु किसी प्रकार की अनिश्चितता नहीं छोड़ना चाहता था और इसलिए उसने बहुत विस्तार में शूद्रों के संपत्ति एकत्रित करने पर प्रतिबंधा लगाया। वह दृढ़ता के साथ कहता हैः
10.129. शूद्र धन-संचय करने की स्थिति में हो, फिर भी ऐसा न करे
क्योंकि जो शूद्र धन-संचय करता है, वह ब्राह्मण को दुःख पहुंचाता है।
इस प्रकार हिन्दू धर्म में व्यवसाय-चयन के लिए अनुमति नहीं है। उसमें आर्थिक स्वतंत्रता नहीं है और कोई आर्थिक सुरक्षा भी नहीं है। आर्थिक दृष्टि से शूद्र की स्थिति बहुत ही कमजोर है।
ज्ञान के प्रसार के लिए दो कसौटियों का पूर्व नियोजित होना आवश्यक है। औपचारिक शिक्षा का होना आवश्यक है। साक्षरता का होना भी आवश्यक है। इन दोनों