हिंदुत्व का दर्शन
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के बगैर शिक्षा का प्रसार नहीं हो सकता। औपचारिक शिक्षा के बगैर जटिल समाज के सभी साधनों और उपलब्धियों का आदान-प्रदान करना संभव नहीं। औपचारिक शिक्षा के बगैर किसी भी विषय से संबंधित संग्रहीत विचारों तथा अनुभवों का युवा-पीढ़ी तक पहुंचना संभव नहीं है और यह विचार तथा अनुभव उन्हें तब तक नहीं मिल सकते, जब तक हम उनको दूसरों के साथ अनौपचारिक संबंध बनाकर शिक्षा प्राप्त करने के लिए छोड़ नहीं देते। औपचारिक शिक्षा के बगैर वह नई दृष्टि प्राप्त नहीं कर सकता। उसका दृष्टिकोण व्यापक नहीं बन सकता और वह अपने दैनिक कार्यक्रमों का गुलाम बनकर अज्ञानी रह जाएगा। परंतु औपचारिक शिक्षा के लिए विशेष माध्यमों, जैसे पाठशालाएं, पुस्तकें, नियोजित साधन-सामग्री और अध्ययन आदि की आवश्यकता होती है। जब तक मनुष्य साक्षर न हो, उसे पढ़ना-लिखना माध्यमों का लाभ कैसे ले सकता है? पढ़ने-लिखने की कला अर्थात् साक्षरता का प्रसार और औपचारिक शिक्षा, यह दोनों बातें साथ-साथ चलने वाली हैं। इन दोनों के अस्तित्व के बगैर ज्ञान का प्रसार नहीं हो सकता है।
इस संदर्भ में हिंदू धर्म की क्या स्थिति है?
औपचारिक शिक्षा का सिद्धांत हिंदू धर्म में बहुत ही सीमित रूप में है। औपचारिक शिक्षा केवल वेदों के अध्ययन तक ही सीमित है। यह स्वाभाविक था क्योंकि हिंदूओं की यह धारणा थी कि वेदों के बाहर कोई ज्ञान नहीं है। ऐसी स्थिति होने के कारण औपचारिक शिक्षा वेदों के अध्ययन तक ही सीमित रही। इसका एक दूसरा परिणाम यह हुआ कि हिंदुओं ने यह माना कि उनका यही कर्तव्य है_ वेदों के अध्ययन के लिए स्थापित पाठशालाओं से केवल ब्राह्मणों को ही लाभ हुआ। शासन के कला तथा विज्ञान के अध्ययन के लिए संस्थाओं की स्थापना करना अपनी जिम्मेदारी नहीं समझी, जिनका व्यापारी तथा मजदूर वर्ग के लिए उपभोग हो सकता था। शासन की इस उपेक्षा के कारण उन्हें दूसरा रास्ता अपनाना पड़ा।
प्रत्येक वर्ग ने, वे जो कार्य परंपरा से करते आ रहे थे, उसे करने का ज्ञान अपने सदस्यों को देने का प्रबंध किया। वैश्य जाति के लोगों का यह कर्तव्य था कि प्रत्येक युवा वैश्य व्यापारिक तंत्र, गणित, कोई भाषा तथा व्यापार की कुछ वास्तविक जानकारी बन सके। इन बातों की शिक्षा उसे उसके पिता के साथ व्यापार करते समय मिल जाती थी। कलाकारों अथवा दस्तकारी वर्ग, जो शूद्रों से उभरा वह अपनी कला, दस्तकारी अपने बच्चों को इसी तरह देने लगा। शिक्षा पारिवारिक बन गई थी। शिक्षा व्यावहारिक थी। उसके केवल विशेष कार्य करने की कुशलता बढ़ाई। उसने नई धारणाएं नहीं बनाईं। उसने दृष्टि का विकास नहीं किया, जिसका नतीजा यह