1. हिंदुत्व का दर्शन - Page 67

52 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

हुआ कि व्यावहारिक शिक्षा ने उसे केवल कार्य करने का एक अलग और समान तरीका सिखाया, जिसे उसकी कुशलता बदलते वातावरण में एक ठोस अयोग्यता बन गई। निरक्षरता हिंदू धर्म का एक कुटिल परंतु संपूर्ण प्रक्रिया का स्वभाविक अंग बन गई। इस प्रक्रिया को समझने के लिए हमारे लिए मनु द्वारा वेदों के अध्ययन तथा शिक्षा से संबंधित जो नियम बनाए गए, उनकी ओर ध्यान देना आवश्यक है। उसमें निम्नलिखित नियमों पर विचार किया गया हैः

1.88. वेदों का अध्ययन करने तथा वेदों की शिक्षा देने का कार्य सृष्टा ने

ब्राह्मणों को सौंपा है।

1.89. क्षत्रियों को उसने (सृष्टा से) आदेश दिया है कि वे वेदों का अध्ययन

करें।

1.90. वैश्यों को उसने (सृष्टा ने) आज्ञा दी.......वे वेदों का अघ्ययन करें।

2.116. जो गुरु की आज्ञा के बगैर वेदों का ज्ञान प्राप्त करेगा, ऐसा माना

जाएगा कि उसने धर्मशास्त्रों की चोरी करने का अपराध किया है और वह

यातनाओं में डूब जाएगा।

4.99. द्विज, शूदों की उपस्थिति में वेदों का अध्ययन न करें।

9.18. स्त्रियों का वेदों के श्लोकों से कोई सरोकार नहीं है।

11.198. यदि किसी द्विज ने (अनुचित रूप से) वेदों का रहस्योद्घाटन किया

है (अर्थात् शूद्रों तथा स्त्रियों को) तो वह (पाप करता है), एक वर्ष जौ

का आहार करके अपने पाप का प्रायश्चित करता है।

इन श्लोकों में तीन भिन्न-भिन्न प्रस्तावों का समावेश है। ब्राह्मण, क्षत्रिय तथा वैश्य वेदों का अध्ययन कर सकते हैं। परंतु इनमें से केवल अकेले ब्राह्मणों को ही वेदों की शिक्षा देने का अधिकार है। परंतु शूद्रों के संबंध में, उनको वेदों का अध्ययन ही नहीं करना चाहिए, बल्कि उसके पठन को भी नहीं सुनना चाहिए।

मनु के उत्तराधिकारियों ने शूद्रों की वेदों के अध्ययन से संबंधित इस अयोग्यता को एक अपराध बना दिया, जिसके लिए कड़ी सजा हो सकेगी।

उदाहरण के लिए गौतम ऋषि ने कहा हैः

12.4. यदि शूद्र जान-बूझकर वेदों का पठन सुनता है, तब उसके कानों में

पिछलता शीशा या लाख डाली जाए। यदि वह वेदों का उच्चारण करता है,

तब उसकी जबान काट दी जाए, यदि वह वेदों पर अपना प्रभुत्व स्थापित

करता है, तब उसके शरीर के टुकड़े-टुकड़े कर दिए जाएं।

कात्यायन ऋषि ने भी इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए हैं।