हिंदुत्व का दर्शन
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ऐसा कहा जा सकता है कि प्राचीन संसार ने सामान्य लोगों को शिक्षा देने की अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल होने का अपराध किया है, परंतु संसार में ऐसा कोई भी समाज नहीं है, जिसने अपनी सामान्य जनता को धर्म-ग्रंथों का अघ्ययन करने की मनाही का अपराध किया हो। किसी भी समाज ने कभी भी अपनी सामान्य जनता पर शिक्षा प्राप्त करने पर प्रतिबंध लगाने का अपराध नहीं किया है। किसी भी समाज ने ऐसी चेष्टा नहीं की कि सामान्य मनुष्यों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने के प्रयासों को दंड देने योग्य अपराध घोषित किया जाए। केवल मनु ही एक ऐसा दैवी कानून बनाने वाला व्यक्ति है, जिसने सामान्य जन के ज्ञान के अधिकार को नकारा।
परंतु, मैं इस पर अधिक चर्चा करने की और प्रतीक्षा नहीं कर सकता। मैं बहुत शीघ्र यह बताने के लिए चिंतित हूं कि सामान्य जनता पर वेदों के अध्ययन के विरुद्ध प्रतिबंध लगाने से किस प्रकार निरक्षरता तथा विधर्मी जीवन के अज्ञान का निर्माण हुआ? इसका उत्तर सरल है। यह बात समझना आवश्यक है कि पढ़ाई-लिखाई का वेदों के अध्ययन तथा शिक्षा से स्वभाविक संबंध है। पढ़ाई-लिखाई उन लोगों के लिए एक आवश्यक चीज थी, जिन्हें वेदों के अध्ययन का विशेष अधिकार था और वे इस अध्ययन के लिए मुक्त थे। जिन्हें वेदों के पढ़ने का अधिकार नहीं था, उनके लिए पढ़ाई-लिखाई आवश्यक नहीं थी। इस प्रकार से शिक्षा वेदों के अध्ययन का एक निमित्त बन गई। नतीजा यह हुआ कि वेद के अध्ययन तथा शिक्षा से संबंधित सिद्धांत पढ़ाई-लिखाई की कला पर भी लागू हो गया। जिन लोगों को वेदों के अध्ययन का अधिकार था, उन लोगों को ही पढ़ने-लिखने का अधिकार प्राप्त हुआ। जिन लोगों को वेदों के अध्ययन का अधिकार नहीं था, उन लोगों को पढ़ने-लिखने के अधिकार से भी वंचित रखा गया। इस प्रकार यह कहना सर्वथा उपयुक्त है कि मनु के विधान के अनुसार पढ़ना-लिखना कुछ मुट्ठी भर ऊंचे वर्णों का अधिकार बन गया और निरक्षरता उन अनके नीचे वर्णों का भाग्य बन गई।
इस विश्लेषण में थोड़ी आगे बढ़ने पर यह स्पष्ट हो जाएगा कि शिक्षा का निषेध करने के कारण मनु ही उस अज्ञान के लिए जिम्मेदार है। जिसमें सर्वसाधारण जनता फंस गई।
इस प्रकार हिंदुत्व ज्ञान के प्रसार का एक माध्यम होने की बजाए, अंधकार का एक सिद्धांत है।
इन तथ्यों पर विचार करते हुए हम यह कह सकते हैं कि स्वतंत्रता की उन्नति के लिए जिन स्थितियों की आवश्यकता होती है, हिन्दू धर्म उनके विरुद्ध है। इसलिए वह स्वतंत्रता को नकारता है।