54 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
IV
क्या हिंदू धर्म बंधुत्व को मान्यता प्रदान करता है?
समाज में दो शक्तियां कार्यरत होती हैं, व्यक्तिवाद और बंधुतत्व। व्यक्तिवाद का सर्वत्र संचार है। प्रत्येक व्यक्ति निरंतर इस तरह के सवाल करता है कि वह तथा उसके पड़ोसी, क्या दोनों भाई-भाई हैं? क्या हम आपस में रिश्तेदार हैं? क्यों मैं उनका पालक हूं? तब मैं उनके साथ क्यों न्याय करूं? और अपने स्वहितों की रक्षा के दबाव में आकर वह ऐसा कार्य करता है, जिसका लक्ष्य केवल उसका अपना अस्तित्व होता है। इसके कारण एक असामाजिक और कभी-कभी समाज-विरोधी व्यक्तित्व का निर्माण होता है। बंधुभाव, बिल्कुल इसके विपरीत एक शक्ति है। यह आपसी मित्रत्व भावना का दूसरा नाम है। बंधुभाव का उस भावना में समावेश होता है, जो एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति की श्रेष्ठता के साथ अपनी पहचान बनाना सिखाती है। जिसके कारण दूसरों की उत्तमता उसके लिए एक स्वाभाविक तथा आवश्यक चीज बन जाती है_ जिसके प्रति उसे उतना ही ध्यान देना चाहिए जितना वह शारीरिक स्थिति के अस्तित्व के लिए अपने पर ध्यान देता है। बंधुत्व की इस भावना के कारण ही एक व्यक्ति अपने-आपको शेष सहयोगी प्राणियों के साथ सुख प्राप्ति के साधनों में स्वयं को प्रतिस्पर्धी नहीं मानता, अन्यथा वह अपने उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उनकी असफलता की कामना करता है, ताकि वह स्वयं सफल हो सके। व्यक्तिवाद से अराजकता का निर्माण होता है। बंधुत्व ही ऐसी भावना है, जो उसे नियंत्रित कर सकती है और मनुष्य मात्र में नैतिक व्यवस्था बनाए रखने में सहायक बन सकती है।
बंधुभाव की आपसी मैत्री की यह भावना कैसे उन्नत हो सकती है? जे. एस. मिल कहते हैं कि यह भावना का नैसर्गिक भाव है।
‘‘मनुष्य के लिए सामाजिक अवस्था एक प्रकार से इतनी अधिक स्वभाविक,
अत्यावश्यक तथा व्यवहारिक बात है किन्हीं कुछ असाधारण परिस्थितियों
अथवा किन्हीं ऐच्छिक अचेतन प्रयासों के अपवाद को छोड़कर, वह समाज
का एक सदस्य है, इस भावना के विपरीत कोई दूसरी बात व्यक्ति सोच भी
नहीं सकता है, और उसका समाज के साथ का वह संबंध, जैसे-जैसे मनुष्य
असभ्य अवस्था से मुक्त हो रहा है, वैसे-वैसे अत्यधिक सुदृढ़ हो रहा है।
इसलिए सामाजिक परिवेश की कोई भी स्थिति, जिसमें वह जन्म लेता है,
और जो मनुष्य-मात्र की नियति है, यह भावना प्रत्येक व्यक्ति के सोच-विचार
का अभिन्न अंग बन जाती है। तब आज, मालिक तथा गुलाम के संबंधों