हिंदुत्व का दर्शन
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का अपवाद छोड़कर मानवप्राणियों के समाज के उस स्वरूप की कल्पना ही
नहीं की जा सकती, जिसमें सभी के हितों की समझ का आधार एक न हो।
समान स्तर के लोगों का समाज केवल इसी धारणा के अनुसार अस्तित्व में
रह सकता है कि सभी को समान माना जाए और क्योंकि सभ्यता की सभी
अवस्थाओं में निरंकुश सम्राट को छोड़कर प्रत्येक व्यक्ति बराबर है, प्रत्येक
व्यक्ति को दूसरों के साथ उन समान शर्तों के आधार पर जीवन व्यतीत करना
ही पड़ता है_ और प्रत्येक युग में एक ऐसी अवस्था विकसित होती रही है,
जिसमें व्यक्ति के लिए दूसरों की शर्तों के अनुसार हमेशा जीवन व्यतीत करना
संभव नहीं होता। इस प्रकार लोग एक ऐसी अवस्था में जीवन व्यतीत करने
के आदी हो जाते हैं, जिसमें इस बात की कल्पना भी नहीं की जा सकती
कि दूसरे लोगों के हितों की अवमानना की जा सकती है।’’
दूसरों के प्रति मित्रत्व की इस भावना का क्या हिंदुओं में कोई स्थान है? इस प्रश्न पर निम्नलिखित तथ्य पर्याप्त प्रकाश डालते हैं।
इस संबंध में किसी का भी ध्यान आकर्षित करने वाली पहली यथार्थता है जातियों की संख्या। किसी ने भी आज तक उनकी वास्तविक संख्या की गिनती नहीं की है, परंतु यह अनुमान किया जा सकता है कि उनकी कुल मिलाकर संख्या दो हजार से कम नहीं होगी, कदाचित वह तीन हजार हो। इस वास्तविकता का केवल यही एक निराशाजनक पहलू नहीं है। कुछ अन्य पहलू भी हैं। जातियों को उपजातियों में विभाजित किया गया है। उनकी संख्या अगणित है। ब्राह्मण जाति की कुल जनसंख्या लगभग डेढ़ करोड़ के बराबर है, परंतु ब्राह्मण जाति में उपजातियों की संख्या 1886 के बराबर है। केवल अकेले पंजाब में ही पंजाब राज्य के सारस्वत ब्राह्मण 469 उपजातियों में, और कायस्थ लोग 590 उपजातियों में विभाजित हैं। इस प्रकार हम इन संख्याओं के आधार पर सामाजिक जीवन को छोटे-छोटे टुकड़ों में विभाजित करने वाली इस अंतहीन प्रक्रिया को स्पष्ट कर सकते हैं।
इस विभाजन की प्रक्रिया का तीसरा पहलू हैं, वे छोटे-छोटे खंड जिनमें जातियां विभाजित हो गईं। बनियों की कुछ उपजातियों की संख्या 100 से अधिक नहीं हो सकती। वह आपस में इतने नजदीकी रिश्तेदार बन गए हैं कि सगोत्रता के नियमों का उल्लंघन किए बिना अपनी ही जाति में विवाह करना उनके लिए बहुत ही कठिन बन गया है।
यहां एक बात ध्यान में रखनी होगी। कौन से छोटे-छोटे कारण इस विभाजन के कारण बने।